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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
ता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्या
आ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्या
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मंज़िलें गर्द की मानिंद उड़ी जाती हैं
अबलक़-ए-दहर कुछ अंदाज़-ए-तग-ओ-ताज़ तो दे
फ़िराक़ गोरखपुरी
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नज़्म
सुर्ख़ सितारा
दिल, नज़र, ज़ेहन, ख़यालात, उसूल ओ अक़दार
सब के सब इस की तग-ओ-ताज़ से लर्ज़ां तरसाँ
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
जी धड़कता है कहीं तार-ए-रग-ए-गुल चुभ न जाए
सेज पर फूलों की करते क़स्द-ए-ख़ुफ़तन आप हैं
बहादुर शाह ज़फ़र
नज़्म
और हवा चुप रही
बे-कराँ आसमानों की पिहनाइयाँ बे-नशेमन शिकस्ता परों की तग-ओ-ताज़ पर बैन करती रहीं
और हवा चुप रही
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
इस के हल्क़े में तग-ओ-ताज़ की वुसअ'त है बहुत
आहू-ए-शहर मिरी बाँहों की ज़ंजीर में आ
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
मैं दोज़ख़-ए-जाँ में भी रहा महव-ए-तग-ओ-ताज़
यूँ कहने को इस 'उम्र का हर लम्हा नया है
अर्श सिद्दीक़ी
नज़्म
'मीर'
बज़्म से गुज़रा कमाल-ए-फ़क़्र दिखलाता हुआ
ताज-ए-शाही पा-ए-इस्ति़ग़ना से ठुकराता हुआ
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
तौसन-ए-नाज़ को फेंके है वो जिस दम सरपट
लोग क्या क्या न तग-ओ-ताज़ में मर जाते हैं












