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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
ता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्या
आ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्या
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मंज़िलें गर्द की मानिंद उड़ी जाती हैं
अबलक़-ए-दहर कुछ अंदाज़-ए-तग-ओ-ताज़ तो दे
फ़िराक़ गोरखपुरी
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नज़्म
सुर्ख़ सितारा
दिल, नज़र, ज़ेहन, ख़यालात, उसूल ओ अक़दार
सब के सब इस की तग-ओ-ताज़ से लर्ज़ां तरसाँ
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
बुरे को तग भी करने और तवक़्क़ो नेक-नामी की
दिमाग़ अपना सँवारो तुम नहीं है ये ख़लल अच्छा
इस्माइल मेरठी
नज़्म
और हवा चुप रही
बे-कराँ आसमानों की पिहनाइयाँ बे-नशेमन शिकस्ता परों की तग-ओ-ताज़ पर बैन करती रहीं
और हवा चुप रही
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
गरचे हैं मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार तग-ओ-दौ में सही
पर तिरी तब' को कब राह पे ला सकते हैं
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
इस के हल्क़े में तग-ओ-ताज़ की वुसअ'त है बहुत
आहू-ए-शहर मिरी बाँहों की ज़ंजीर में आ


