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ग़ज़ल
तरब-आशना-ए-ख़रोश हो तू नवा है महरम-ए-गोश हो
वो सरोद क्या कि छुपा हुआ हो सुकूत-ए-पर्दा-ए-साज़ में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
किसे ज़िंदगी है अज़ीज़ अब किसे आरज़ू-ए-शब-ए-तरब
मगर ऐ निगार-ए-वफ़ा तलब तिरा ए'तिबार कोई तो हो
अहमद फ़राज़
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नज़्म
ए'तिराफ़
मैं कि ख़ुद अपने मज़ाक़-ए-तरब-आगीं का शिकार
वो गुदाज़-ए-दिल-ए-मरहूम कहाँ से लाऊँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल
सोहबत-ए-यार में आग़ाज़-ए-तरब की सूरत
हर्फ़-ए-नफ़रत कोई शमशीर-ए-ग़ज़ब हो जैसे












