अता तुराब

ग़ज़ल 6

अशआर 8

चाहिए क्या तुम्हें तोहफ़े में बता दो वर्ना

हम तो बाज़ार के बाज़ार उठा लाएँगे

यूँ मोहब्बत से हम ख़ाना-ब-दोशों को बुला

इतने सादा हैं कि घर-बार उठा लाएँगे

हाँ तुझे भी तो मयस्सर नहीं तुझ सा कोई

है तिरा अर्श भी वीराँ मिरे पहलू की तरह

तराश और भी अपने तसव्वुर-ए-रब को

तिरे ख़ुदा से तो बेहतर मिरा सनम है अभी

तूफ़ान-ए-बहर ख़ाक डराता मुझे 'तुराब'

उस से बड़ा भँवर तो सफ़ीने के बीच था

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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