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नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
रबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रा
सबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
क्या सुनाता है मुझे turk-o-arab की दास्ताँ
मुझ से कुछ पिन्हाँ नहीं इस्लामियों का सोज़-ओ-साज़
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
मुझ को हैरत है कि की उम्र बसर उस ने कहाँ
इस जहालत पे तो ने तुर्क न ताजीक है दिल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
कितने ही फ़ैसले किए पर कहाँ रुक सका हूँ मैं
आज भी अपने वक़्त पर घर से निकल पड़ा हूँ मैं
ज़ियाउल मुस्तफ़ा तुर्क
नज़्म
ख़ुश-आमदीद
तुर्क-ए-शीराज़ हो तुम हाफ़िज़-ए-शीराज़ हूँ मैं
अब समरक़ंद-ओ-बुख़ारा है तुम्हारी ख़ातिर
अंजुम आज़मी
नज़्म
पुराना कोट
न देख कुहनियों पे इस की ख़स्ता-सामानी
पहन चुके हैं इसे तुर्क और ईरानी




