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ग़ज़ल
तुम्हारे पास आते हैं तो साँसें भीग जाती हैं
मोहब्बत इतनी मिलती है कि आँखें भीग जाती हैं
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
मिरे मास्टर न होते जो उलूम-ओ-फ़न में दाना
कभी मौला-बख़्श-साहब का न मैं शिकार होता
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
नौ-जवान से
न देख ज़ोहद की तू इस्मत-ए-गुनह-आलूद
गुनह में फ़ितरत-ए-इस्मत-मआब पैदा कर
असरार-उल-हक़ मजाज़
उद्धरण
जो मुल़्क जितना ग़ुर्बत-ज़दा होगा उतना ही आलू और मज़हब का चलन ज़्यादा होगा।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी
सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
नज़्म
हिण्डोला
यहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईं
इसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनून







