आलोक यादव

ग़ज़ल 21

शेर 12

नई नस्लों के हाथों में भी ताबिंदा रहेगा

मैं मिल जाऊँगा मिट्टी में क़लम ज़िंदा रहेगा

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दिलकशी थी उन्सियत थी या मोहब्बत या जुनून

सब मराहिल तुझ से जो मंसूब थे अच्छे लगे

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प्यार का दोनों पे आख़िर जुर्म साबित हो गया

ये फ़रिश्ते आज जन्नत से निकाले जाएँगे

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सुन रहा हूँ कि वो आएँगे हँसाने मुझ को

आँसुओ तुम भी ज़रा रंग जमाए रखना

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मुझ को जन्नत के नज़ारे भी नहीं जचते हैं

शहर-ए-जानाँ ही तसव्वुर में बसा है साहब

हिंदी ग़ज़ल 1

 

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