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ग़ज़ल
मैं मुर्दा पानियों में चाँद सा रवाँ देखूँ
वो वरसे में मुझे ख़्वाहिश की झील छोड़ गया
मुसव्विर सब्ज़वारी
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ग़ज़ल
वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था
अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
नज़्म
हम जो तारीक राहों में मारे गए
तेरे होंटों के फूलों की चाहत में हम
दार की ख़ुश्क टहनी पे वारे गए












