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नज़्म
जहाँ 'रेहाना' रहती थी
मिरे अफ़्सानों की दुनिया मिरे विज्दान की बस्ती
यहीं 'रेहाना' बस्ती थी यहीं 'रेहाना' बस्ती थी
अख़्तर शीरानी
नज़्म
तुम ने लिक्खा है
तुम ने देखी न धड़कते हुए जज़्बों की सरिश्त
मेरे विज्दान ने तख़्लीक़ किया था जिस को
प्रेम वारबर्टनी
ग़ज़ल
न हो जो ज़िंदगी अंजाम वो विज्दान-ए-नाक़िस है
हुज़ूर-ए-शम' बा'द-ए-वज्द परवाने पे क्या गुज़री
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
निहाँ हो ज़ेहन में विज्दान का धुआँ बन कर
उफ़ुक़ पे मंज़िल-ए-इदराक का निशाँ भी तुम्ही
अहमद नदीम क़ासमी
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ग़ज़ल
हूँ आँखें एक ख़्वाब पे क़ुर्बान करके ख़ुश
और जिस्म नज़्र-ए-आतिश-ए-विज्दान करके ख़ुश
यासिर ख़ान इनाम
ग़ज़ल
नग़्मा-ए-इश्क़ सुनाता हूँ मैं इस शान के साथ
रक़्स करता है ज़माना मिरे विज्दान के साथ
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
जितने आँसू हैं सभी नज़्र किए हैं तुम को
हम ने हर शेर के विज्दान में रक्खा है तुम्हें
तारिक़ क़मर
क़ितआ
ज़ेहन ओ विज्दान में यूँ फ़ासले तन जाते हैं
शाम की बात भी लगती है बहुत दूर की बात
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
इक सवाल ख़ुदा-ए-बरतर से
ज़ेहन से विज्दान के चश्मे उबलते हों,
जहाँ रातों के सन्नाटे में
साजिदा ज़ैदी
नज़्म
सस्ती नज़्म
मैं ने अब तक किसी कोख वीरानी का हाल लिक्खा नहीं
क्यूँ ये वहशी क़लम मेरे विज्दान में नज़्म बोता नहीं








