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कैफ़ी विजदानी

1932 | बरेली, भारत

जाने माने शायर / विख्यात उत्रर-आधनिक शायर शारिक़ कैफ़ी के पिता

जाने माने शायर / विख्यात उत्रर-आधनिक शायर शारिक़ कैफ़ी के पिता

कैफ़ी विजदानी

ग़ज़ल 8

शेर 7

ख़ुद ही उछालूँ पत्थर ख़ुद ही सर पर ले लूँ

जब चाहूँ सूने मौसम से मंज़र ले लूँ

बचा लिया तिरी ख़ुश्बू के फ़र्क़ ने वर्ना

मैं तेरे वहम में तुझ से लिपटने वाला था

मेरे रस्ते में जो रौनक़ थी मेरे फ़न की थी

मेरे घर में जो अंधेरा था मेरा अपना था

तू इक क़दम भी जो मेरी तरफ़ बढ़ा देता

मैं मंज़िलें तिरी दहलीज़ से मिला देता

सिर्फ़ दरवाज़े तलक जा के ही लौट आया हूँ

ऐसा लगता है कि सदियों का सफ़र कर आया

पुस्तकें 1

Aazar Ke Sanam

 

1971

 

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