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ग़ज़ल
अबस इन शहरियों में वक़्त अपना हम किए ज़ाए
किसी मजनूँ की सोहबत बैठ दीवाने हुए होते
सिराज औरंगाबादी
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ग़ज़ल
उस के लिए भी ग़म-ज़ा-ए-नाज़-ओ-अदा का वक़्त है
अपने लिए भी मौसम-ए-हिज्र-ओ-विसाल है नया
अतहर नफ़ीस
शेर
अबस इन शहरियों में वक़्त अपना हम किए ज़ाए
किसी मजनूँ की सोहबत बैठ दीवाने हुए होते
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
जब उस की बर्क़-ए-हुस्न से पर्दा हुआ है वा
ज़ाए हुए हैं तालिब-ए-दीदार हर तरफ़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
पुरानी फ़ाइलों में गुनगुनाती शाम
इन ख़तों की क्यूँ हिफ़ाज़त चाहिए
ये पुरानी फाइलें ज़ाए अगर हो जाएँ
ऐन ताबिश
ग़ज़ल
क्या बताऊँ मुझ को आख़िर ज़िंदगी से क्या मिला
'उम्र जो थी रफ़्तगाँ के ग़म में ज़ाए' हो गई









