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ग़ज़ल
रहा न होगा मिरा शौक़-ए-क़त्ल बे-तहसीं
ज़बान-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल ने दाद दी होगी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
शहादत दे के जिस को पी गया मर्द-ए-मुजाहिद भी
वो ना'रा अब ज़बान-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल से निकलेगा
कुंदन अरावली
ग़ज़ल
अब ज़बाँ ख़ंजर-ए-क़ातिल की सना करती है
हम वही करते हैं जो ख़ल्क़-ए-ख़ुदा करती है
इरफ़ान सिद्दीक़ी
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विषय
क़ातिल
क़ातिल शायरी
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ग़ज़ल
अभी और तेज़ कर ले सर-ए-ख़ंजर-ए-अदा को
मिरे ख़ूँ की है ज़रूरत तिरी शोख़ी-ए-हिना को
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
काम अपना तो तमाम किया यास ने 'हवस'
जी इश्तियाक़-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल में रह गया

