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ग़ज़ल
इक क़लंदर की तरह वक़्त रहा महव-ए-ख़िराम
उस ने कब ध्यान ''तलब'' शोर-ए-सगाँ पर रक्खा
ख़ुर्शीद तलब
ग़ज़ल
ब-क़द्र-ए-ज़ौक़-ए-तलब मय अता हो रिंदों को
ये मै-कदा है यहाँ रस्म-ए-बेश-ओ-कम क्यों हो
मजीद खाम गानवी
ग़ज़ल
ख़ामी-ए-ज़ौक़-ए-तलब ने हमें रक्खा महरूम
ये ग़लत है न सुनी हो तिरी आवाज़ कहीं
सग़ीर अहमद सग़ीर अहसनी
ग़ज़ल
मिरी तमन्ना भी और कब तक रहीन-ए-ज़ौक़-ए-तलब रहेगी
मिरी मोहब्बत मिरा ही जीना करेगी मुझ पर हराम कब तक
शैख़ हसन मुश्किल अफ़कारी
ग़ज़ल
राज़-ए-सर-बस्ता रहे यूँ कि किसी पर न खुले
जज़्बा-ए-ज़ौक़-ए-तलब हुस्न-ए-नज़र होने तक
सूफ़ी ज़मज़म बिजनोरी
ग़ज़ल
वहशत-ए-ज़ौक़-ए-तलब में जब उठे बढ़ते गए
किस को दामान-ए-जुनून-ए-शौक़ का अंदाज़ था