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ग़ज़ल
ख़ामी-ए-ज़ौक़-ए-तलब ने हमें रक्खा महरूम
ये ग़लत है न सुनी हो तिरी आवाज़ कहीं
सग़ीर अहमद सग़ीर अहसनी
ग़ज़ल
दो क़दम भी न चले राह-ए-वफ़ा में हम लोग
है अभी ज़ौक़-ए-तलब ख़ाम तुम्हें क्या मा'लूम
फ़ैज़ुल हसन ख़्याल
ग़ज़ल
राज़-ए-सर-बस्ता रहे यूँ कि किसी पर न खुले
जज़्बा-ए-ज़ौक़-ए-तलब हुस्न-ए-नज़र होने तक
सूफ़ी ज़मज़म बिजनोरी
ग़ज़ल
अभी तक रास्ते के पेच-ओ-ख़म से दिल धड़कता है
मिरा ज़ौक़-ए-तलब शायद अभी तक ख़ाम है साक़ी