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ग़ज़ल
गर मुसीबत थी तो ग़ुर्बत में उठा लेता 'असद'
मेरी दिल्ली ही में होनी थी ये ख़्वारी हाए हाए
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
है अब इस मामूरे में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फ़त 'असद'
हम ने ये माना कि दिल्ली में रहें खावेंगे क्या
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था