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ग़ज़ल
देखी ये चाह उन की अँधेरे कुएँ के बीच
फेंका लपेट कुश्ते को अपने गुलम के साथ
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
वो नए गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें
वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो