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ग़ज़ल
नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-वफ़ा क्या जानें
कोई ना-शाद सिखा दे उन्हें नालाँ होना
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
नाम भी लेना है जिस का इक जहान-ए-रंग-ओ-बू
दोस्तो उस नौ-बहार-ए-नाज़ की बातें करो
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
मिरी रात मुंतज़िर है किसी और सुब्ह-ए-नौ की
ये सहर तुझे मुबारक जो है ज़ुल्मतों की मारी