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ग़ज़ल
है मुग़ालता भी अजीब शय वो न याद आएगा ता-ब-के
जो छुपा के अपने ही ज़ेहन में ये समझ लिया कि भुला दिया
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
दीवाने ख़त-ओ-ज़ुल्फ़ के सौदे की लहर में
क्या क्या न बके सुम्बुल-ओ-रैहाँ से उलझ कर
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
ग़ज़ल
सुनें वो या न सुनें ये बके ही जाता है
रक़ीब-ए-यावा-ए-गो को है अपनी टर से ग़रज़
इनायत अली ख़ान इनायत
ग़ज़ल
होते रहोगे ता-ब-के शर्मिंदा-ए-एहसान-ए-ग़ैर
यारो यहाँ की चंद-रोज़ा ज़िंदगी के वास्ते
रहबर ताबानी दरियाबादी
ग़ज़ल
ख़ारहा-ए-राह को पैरों से कब तक रौंदिए
ता-ब-के ख़ुश-फ़हमियों को नज़्र-ए-आइंदा करें