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ग़ज़ल
वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है
ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है
बशीर बद्र
ग़ज़ल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
हम ऐसे सादा-दिलों की नियाज़-मंदी से
बुतों ने की हैं जहाँ में ख़ुदाइयाँ क्या क्या
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
आलम-ए-हुस्न ख़ुदाई है बुतों की ऐ 'ज़ौक़'
चल के बुत-ख़ाने में बैठो कि ख़ुदा याद रहे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
लकद कूब-ए-हवादिस का तहम्मुल कर नहीं सकती
मिरी ताक़त कि ज़ामिन थी बुतों की नाज़ उठाने की
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर
अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता