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ग़ज़ल
अपने हाथों पर लिए फिरते हैं वो हर दम हलफ़
आड़ क़समों की तो मुझ से बारहा पकड़ी गई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
मोहब्बत में उठाते हैं हलफ़ सब 'शाज़िया-अकबर’
न-जाने कौन है जो राज़-ए-शाम-ए-अंजुमन खोले