aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "kanda"
किस फ़ुर्सत-ए-विसाल पे है गुल को अंदलीबज़ख़्म-ए-फ़िराक़ ख़ंदा-ए-बे-जा कहें जिसे
ख़ाक-बाज़ी-ए-उम्मीद कार-ख़ाना-ए-तिफ़्लीयास को दो-आलम से लब-ब-ख़ंदा वा पाया
कहीं है नग़्मा-ए-बुलबुल कहीं है ख़ंदा-ए-गुलअयाँ है जोश-ए-शबाब-ए-बहार ईद के दिन
फूट निकलेगा जबीं से एक चश्मा हुस्न कासुब्ह उठ कर ख़ंदा-ए-सामान-ए-क़ुदरत देखिए
किसी के मरमरीं आईने में नुमायाँ हैंघटा बहार धनक चाँद फूल दीप कली
तू पस-ए-ख़ंदा-लबी आहों की आवाज़ें तो सुनये हँसी तो आई है आँसू छुपाने के लिए
नहीं गिर्या ओ ख़ंदा में फ़र्क़ कोईजो रोता गया दिल तो हँसता गया दिल
आमद-ए-ख़त से न कर ख़ंदा-ए-शीरीं कि मबादचश्म-ए-मोर आईना-ए-दिल निगरानी माँगे
चले तो ख़ंदा-मिज़ाजी से जा रहे थे हमकिसी हसीन ने रस्ते में आ के मार दिया
तू कि अंजान है इस शहर के आदाब समझफूल रोए तो उसे ख़ंदा-ए-शादाब समझ
देख आएँ चलो हम भी जिस बज़्म में सुनते हैंजो ख़ंदा-ब-लब आए वो ख़ाक-बसर जाए
बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुलकहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का
तिश्ना-लब क्यूँ रहे ऐ साक़ी-ए-कौसर 'चंदा'ये तिरे जाम-ए-मोहब्बत को पिए बैठी है
अब तज़्किरा-ए-ख़ंदा-ए-गुल बार है जी परजाँ वक़्फ़-ए-ग़म-ए-गिर्या-ए-शबनम है मिरी जाँ
मुझ को अर्ज़ानी रहे तुझ को मुबारक होजियोनाला-ए-बुलबुल का दर्द और ख़ंदा-ए-गुल का नमक
ख़ंदा-ए-सुब्ह-ए-अज़ल तीरगी-ए-शाम-ए-अबददोनों आलम हैं छलकते हुए पैमानों में
ग़म-ए-फ़िराक़ में तकलीफ़-ए-सैर-ए-बाग़ न दोमुझे दिमाग़ नहीं ख़ंदा-हा-ए-बेजा का
है आरमीदगी में निकोहिश बजा मुझेसुब्ह-ए-वतन है ख़ंदा-ए-दंदाँ-नुमा मुझे
ख़ंदा-ए-यार से तरफ़ हो करबर्क़ ने अपनी जग-हँसाई की
चंदा भी बस रात में अच्छा लगता हैहर बंदा औक़ात में अच्छा लगता है
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