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ग़ज़ल
यहाँ तक आए हैं तय हम दो-मंज़िला कर के
तुम्हारी बज़्म में पहुँचे हैं आज-कल के चले
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
हज़ार दिल है तिरा मशरिक़-ए-मह-ओ-ख़ुर्शीद
ग़ुबार-ए-मंज़िल-ए-जानाँ नहीं तो कुछ भी नहीं
रविश सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
वाए क़िस्मत पाँव की ऐ ज़ोफ़ कुछ चलती नहीं
कारवाँ अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है