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ग़ज़ल
'बक़ा' हम गब्र-ए-ना-मुस्लिम थे पर आ कर ब-नाचारी
वो मुस्लिम-ज़ादा तिफ़्लों में मुसलमाँ हो के मिल बैठे
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
इज़हार करते दिल की ख़मोशी ज़रा बता
बदला है ग़म कि ग़म का मुदावा बदल गया