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नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
''कोई नहीं आएगा ये कीड़े निकालने अब
कि उन को तो शहर में धुआँ दे के मारा जाता है नालियों में'
गुलज़ार
नज़्म
दरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसी
बीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहे
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
बादल खड़े हैं सर पर बरसे हैं थोड़े थोड़े
बूंदों में भीगते हैं लाल और गुलाबी जोड़े
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मिरी आँखों में आँखें डाल कर जब मुस्कुराती थी
मिरे ज़ुल्मत-कदे का ज़र्रा ज़र्रा जगमगाता था