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नज़्म
ज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैं
कैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूर
मायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूर
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
उस रंग-भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
अपना कुछ ग़म नहीं है पर ये ख़याल आता है
मादर-ए-हिन्द पे कब से ये ज़वाल आता है
राम प्रसाद बिस्मिल
नज़्म
सीनों से लग रही हैं जो हैं पिया की प्यारी
छाती फटे है उन की जो हैं बिरह की मारी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इक मादर-ए-मुफ़लिस ईद के दिन बच्चों को लिए बहलाती है
सर उन का कभी सहलाती है नर्मी से कभी समझाती है
नुशूर वाहिदी
नज़्म
मैं अजनबी नहीं रहा हयात से ममात से
वो दुख सहे कि मुझ पे खुल गया है दर्द-ए-काएनात