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नज़्म
रुलाता है तिरा नज़्ज़ारा ऐ हिन्दोस्ताँ मुझ को
कि इबरत-ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वो माँ कि आयत-ए-रहमत है जिस की चीन-ए-जबीं
वो माँ कि हाँ से भी होती है बढ़ के जिस की नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
ख़्वाब-गह शाहों की है ये मंज़िल-ए-हसरत-फ़ज़ा
दीदा-ए-इबरत ख़िराज-ए-अश्क-ए-गुल-गूँ कर अदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ईस्तादा सर्व के साए में थे मौला-ए-रूम
जिन के फ़र्मूदात में मुज़्मर हैं आयात-ए-मुबीं
शोरिश काश्मीरी
नज़्म
चश्म-ए-हक़-बीं के लिए इबरत के नज़्ज़ारे मिले
हस्ती-ए-इंसान पे जो ज़िंदगानी देख कर
मयकश अकबराबादी
नज़्म
बरसों बा'द जब उस को देखा फूल सा चेहरा बदल चुका था
पेशानी पर फ़िक्र की आयत आँखें अब संजीदा थीं
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
तमाम आयात-ए-क़ुर्आनी, वज़ीफ़े और मुनाजातें
कि जिन के विर्द से सारी बलाएँ दूर रहती हैं