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नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
रिश्वतों की ज़िंदगी है चोर-बाज़ारी के साथ
चल रही है बे-ज़री अहकाम-ए-ज़रदारी के साथ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
अली मोहम्मद फ़र्शी
नज़्म
उसे सब वहम कहते हैं ख़िलाफ़-ए-अक़्ल कहते हैं
मगर पक्का यक़ीं है जब कोई टूटा हुआ तारा
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
मज्लिस-ए-‘इश्क़ में पाता हूँ इसे मैं मदहोश
महफ़िल-ए-'अक़्ल में देखा तो ये हुशियार भी है
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
फिर इश्क़-ए-ना-सुबूर का परतव है रूह पर
फिर दिल हुज़ूर-ए-अक़्ल पशेमाँ है क्या करूँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
कभी मैं ज़ौक़-ए-तकल्लुम में तूर पर पहुँचा
छुपाया नूर-ए-अज़ले ज़ेर-ए-आस्तीं मैं ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
होश-ओ-हवास-ओ-अक़ल-ओ-ख़िरद जोश-ओ-वलवले
सब कहते हैं पुकार के लो अब तो हम चले