aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bevafaa"
जब मैं तुम्हें नशात-ए-मोहब्बत न दे सकाग़म में कभी सुकून-ए-रिफ़ाक़त न दे सकाजब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैंजब मेरे सारे ख़्वाब किसी बेवफ़ा के हैंफिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहींतन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
तुम्हें मेरी हवस-पेशामिरी सफ़्फ़ाक क़ातिल बेवफ़ाई का गुमाँ तक
इस क़दर भी नहीं मुझे मा'लूमकिस मोहल्ले में है मकाँ तेराकौन सी शाख़-ए-गुल पे रक़्साँ हैरश्क-ए-फ़िरदौस आशियाँ तेराजाने किन वादियों में उतरा हैग़ैरत-ए-हुस्न कारवाँ तेराकिस से पूछूँगा मैं ख़बर तेरीकौन बतलाएगा निशाँ तेरातेरी रुस्वाइयों से डरता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँहाल-ए-दिल भी न कह सका गरचेतू रही मुद्दतों क़रीब मिरेकुछ तिरी अज़्मतों का डर भी थाकुछ ख़यालात थे अजीब मिरेआख़िर-ए-कार वो घड़ी आईबार-वर हो गए रक़ीब मिरेतू मुझे छोड़ कर चली भी गईख़ैर क़िस्मत मिरी नसीब मिरेअब मैं क्यूँ तुझ को याद करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँगो ज़माना तिरी मोहब्बत काएक भूली हुई कहानी हैतेरे कूचे में उम्र-भर न गएसारी दुनिया की ख़ाक छानी हैलज़्ज़त-ए-वस्ल हो कि ज़ख़्म-ए-फ़िराक़जो भी हो तेरी मेहरबानी हैकिस तमन्ना से तुझ को चाहा थाकिस मोहब्बत से हार मानी हैअपनी क़िस्मत पे नाज़ करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँअश्क पलकों पे आ नहीं सकतेदिल में है तेरी आबरू अब भीतुझ से रौशन है काएनात मिरीतेरे जल्वे हैं चार-सू अब भीअपने ग़म-ख़ाना-ए-तख़य्युल मेंतुझ से होती है गुफ़्तुगू अब भीतुझ को वीराना-ए-तसव्वुर मेंदेख लेता हूँ रू-ब-रू अब भीअब भी मैं तुझ को प्यार करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँआज भी कार-ज़ार-ए-हस्ती मेंतू अगर एक बार मिल जाएकिसी महफ़िल में सामना हो जाएया सर-ए-रहगुज़ार मिल जाएइक नज़र देख ले मोहब्बत सेएक लम्हे का प्यार मिल जाएआरज़ूओं को चैन आ जाएहसरतों को क़रार मिल जाएजाने क्या क्या ख़याल करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँआज मैं ऐसे मक़ाम पर हूँ जहाँरसन-ओ-दार की बुलंदी हैमेरे अशआ'र की लताफ़त मेंतेरे किरदार की बुलंदी हैतेरी मजबूरियों की अज़्मत हैमेरे ईसार की बुलंदी हैसब तिरे दर्द की इनायत हैसब तिरे प्यार की बुलंदी हैतेरे ग़म से निबाह करता हैजब तिरे शहर से गुज़रता हूँतुझ से कोई गिला नहीं मुझ कोमैं तुझे बेवफ़ा नहीं कहतातेरा मिलना ख़याल-ओ-ख़्वाब हुआफिर भी ना-आश्ना नहीं कहतावो जो कहता था मुझ को आवारामैं उसे भी बुरा नहीं कहतावर्ना इक बे-नवा मोहब्बत मेंदिल के लुटने पे क्या नहीं कहतामैं तो मुश्किल से आह भरता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँकोई पुर्सान-ए-हाल हो तो कहूँकैसी आँधी चली है तेरे बा'ददिन गुज़ारा है किस तरह मैं नेरात कैसे ढली है तेरे बा'दशम-ए-उम्मीद सरसर-ए-ग़म मेंकिस बहाने जली है तेरे बा'दजिस में कोई मकीं न रहता होदिल वो सूनी गली है तेरे बा'दरोज़ जीता हूँ रोज़ मरता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँलेकिन ऐ साकिन-ए-हरीम-ए-ख़यालयाद है दौर-ए-कैफ़-ओ-कम कि नहींक्या कभी तेरे दिल पे गुज़रा हैमेरी महरूमियों का ग़म कि नहींमेरी बर्बादियों का सुन कर हालआँख तेरी हुई है नम कि नहींऔर इस कार-ज़ार-ए-हस्ती मेंफिर कभी मिल सकेंगे हम कि नहींडरते डरते सवाल करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँ
तुम उस की याद भुला दो कि बेवफ़ा है वोहर एक दिल नहीं होता तुम्हारे दिल की तरहतुम अपने प्यार को रुस्वा करो न रो रो करतुम्हारा प्यार मुक़द्दस है बाइबल की तरह
मुद्दतों मैं इक अंधे कुएँ में असीरसर पटकता रहा गिड़गिड़ाता रहारौशनी चाहिए، चाँदनी चाहिए، ज़िंदगी चाहिएरौशनी प्यार की, चाँदनी यार की, ज़िंदगी दार कीअपनी आवाज़ सुनता रहा रात दिनधीरे धीरे यक़ीं दिल को आता रहासूने संसार मेंबेवफ़ा यार मेंदामन-ए-दार मेंरौशनी भी नहींचाँदनी भी नहींज़िंदगी भी नहींज़िंदगी एक रातवाहिमा काएनातआदमी बे-बिसातलोग कोताह-क़दशहर शहर-ए-हसदगाँव इन से भी बदइन अंधेरों ने जब पीस डाला मुझेफिर अचानक कुएँ ने उछाला मुझेअपने सीने से बाहर निकाला मुझेसैकड़ों मिस्र थे सामनेसैकड़ों उस के बाज़ार थेएक बूढ़ी ज़ुलेख़ा नहींजाने कितने ख़रीदार थेबढ़ता जाता था यूसुफ़ का मोललोग बिकने को तय्यार थे
तुम नहीं आए थे जब तब भी तो मौजूद थे तुमआँख में नूर की और दिल में लहू की सूरतदर्द की लौ की तरह प्यार की ख़ुश्बू की तरहबेवफ़ा वादों की दिलदारी का अंदाज़ लिएतुम नहीं आए थे जब तब भी तो तुम आए थेरात के सीने में महताब के ख़ंजर की तरहसुब्ह के हाथ में ख़ुर्शीद के साग़र की तरहशाख़-ए-ख़ूँ-रंग-ए-तमन्ना में गुल-ए-तर की तरहतुम नहीं आओगे जब तब भी तो तुम आओगेयाद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरतग़म के पैमाना-ए-सर-शार को छलकाते हुएबर्ग-हा-ए-लब-ओ-रुख़्सार को महकाते हुएदिल के बुझते हुए अँगारे को दहकाते हुएज़ुल्फ़-दर-ज़ुल्फ़ बिखर जाएगा फिर रात का रंगशब-ए-तन्हाई में भी लुत्फ़-ए-मुलाक़ात का रंगरोज़ लाएगी सबा कू-ए-सबाहत से पयामरोज़ गाएगी सहर तहनियत-ए-जश्न-ए-फ़िराक़आओ आने की करें बातें कि तुम आए होअब तुम आए हो तो मैं कौन सी शय नज़्र करोकि मिरे पास ब-जुज़ मेहर ओ वफ़ा कुछ भी नहींएक ख़ूँ-गश्ता तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं
इस से पहले कि तेरी चश्म-ए-करममा'ज़रत की निगाह बन जाएइस से पहले कि तेरे बाम का हुस्नरिफ़अत-ए-मेहर-ओ-माह बन जाएप्यार ढल जाए मेरे अश्कों मेंआरज़ू एक आह बन जाएमुझ पे आ जाए इश्क़ का इल्ज़ामऔर तू बे-गुनाह बन जाएमैं तिरा शहर छोड़ जाऊँगाइस से पहले कि सादगी तेरीलब-ए-ख़ामोश को गिला कह देमैं तुझे चारागर ख़याल करूँतू मिरे ग़म को ला-दवा कह देतेरी मजबूरियाँ न देख सकेऔर दिल तुझ को बेवफ़ा कह देजाने मैं बे-ख़ुदी में क्या पूछूँजाने तू बे-रुख़ी से क्या कह देमैं तिरा शहर छोड़ जाऊँगाचारा-ए-दर्द हो भी सकता थामुझ को इतनी ख़ुशी बहुत कुछ हैप्यार गो जावेदाँ नहीं फिर भीप्यार की याद भी बहुत कुछ हैआने वाले दिनों की ज़ुल्मत मेंआज की रौशनी बहुत कुछ हैउस तही-दामनी के आलम मेंजो मिला है वही बहुत कुछ हैमैं तिरा शहर छोड़ जाऊँगाछोड़ कर साहिल-ए-मुराद चलाअब सफ़ीना मिरा कहीं ठहरेज़हर पीना मिरा मुक़द्दर हैऔर तिरे होंट अंग्बीं ठहरेकिस तिरा तेरे आस्ताँ पे रुकूँजब न पाँव तले ज़मीं ठहरेउस से बेहतर है दिल यही समझेतू ने रोका था हम नहीं ठहरेमैं तिरा शहर छोड़ जाऊँगामुझ को इतना ज़रूर कहना हैवक़्त-ए-रुख़्सत सलाम से पहलेकोई नामा नहीं लिखा मैं नेतेरे हर्फ़-ए-पयाम से पहलेतोड़ लूँ रिश्ता-ए-नज़र में भीतुम उतर जाओ बाम से पहलेले मिरी जान मेरा वा'दा हैकल किसी वक़्त शाम से पहलेमैं तिरा शहर छोड़ जाऊँगा
वफ़ा भी जिस पे है नाज़ाँ वो बेवफ़ा तुम होजो खो गई है मिरे दिल की वो सदा तुम होबहुत क़रीब हो तुम फिर भी मुझ से कितनी दूरहिजाब-ए-जिस्म अभी है हिजाब-ए-रूह अभीअभी तो मंज़िल-ए-सद-मेहर-ओ-माह बाक़ी हैहिजाब-ए-फ़ासला-हा-ए-निगाह बाक़ी हैविसाल-ए-यार अभी तक है आरज़ू का फ़रेब
तेरे भी दिल में हूक सी उठ्ठे ख़ुदा करेतू भी हमारी याद में तड़पे ख़ुदा करेमजरूह हो बला से तिरे हुस्न का ग़ुरूरपर तुझ को चश्म-ए-शौक़ न देखे ख़ुदा करेखो जाएँ तेरे हुस्न की रानाइयाँ तमामतेरी अदा किसी को न भाए ख़ुदा करेमेरी ही तरह कश्ती-ए-दिल हो तिरी तबाहतूफ़ान इतने ज़ोर का उठ्ठे ख़ुदा करेराहों के पेच-ओ-ख़म में रहे ता-हयात गुममंज़िल तिरे क़रीब न आए ख़ुदा करेज़ुल्मत हो तू हो और तिरी रहगुज़ार होदुनिया में तेरी सुब्ह न फूटे ख़ुदा करेतुझ पर नशात-ओ-ऐश की रातें हराम होंमर जाएँ तेरे साज़ के नग़्मे ख़ुदा करेआएँ न तेरे बाग़ में झोंके नसीम केतेरा गुल-ए-शबाब न महके ख़ुदा करेहर लम्हा तेरी रूह को इक बे-कली सी होऔर बे-कली में नींद न आए ख़ुदा करेहो तेरे दिल में मेरी ख़लिश मेरी आरज़ूमेरे बग़ैर चैन न आए ख़ुदा करेतू जा रही है बज़्म-ए-तरब में तो ख़ैर जापर तेरा जी वहाँ भी न बहले ख़ुदा करेअल-मुख़्तसर हों जितने सितम तुझ पे टूट जाएँलेकिन ये रब्त-ए-ज़ीस्त न टूटे ख़ुदा करेजो कुछ मैं कह गया हूँ जुनूँ में वो सब ग़लततुझ पर कोई भी आँच न आए ख़ुदा करेतू है मता-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र बेवफ़ा सहीहै रौशनी-ए-दाग़-ए-जिगर बेवफ़ा सही
तिरे जमाल से ऐ आफ़्ताब-ए-नन्कानानिखर निखर गया हुस्न-ए-शुऊ'र-ए-रिंदानाकुछ ऐसे रंग से छेड़ा रबाब-ए-मस्तानाकि झूमने लगा रूहानियत का मय-ख़ानातिरी शराब से मदहोश हो गए मय-ख़्वारदुई मिटा के हम आग़ोश हो गए मय-ख़्वारतिरा पयाम था डूबा हुआ तबस्सुम मेंभरी थी रूह-ए-लताफ़त तिरे तकल्लुम मेंनवा-ए-हक़ की कशिश थी तिरे तरन्नुम मेंयक़ीं की शम्अ' जलाई शब-ए-तवहहुम मेंदिलों को हक़ से हम-आहंग कर दिया तू नेगुलों को गूँध के यक-रंग कर दिया तू नेतिरी नवा ने दिया नूर आदमियत कोमिटा के रख दिया हिर्स-ओ-हवा की ज़ुल्मत कोदिलों से दूर किया सीम-ओ-ज़र की रग़बत कोकि पा लिया था तिरे दिल ने हक़ की दौलत कोहुजूम-ए-ज़ुल्मत-ए-बातिल में हक़-पनाही कीफ़क़ीर हो के भी दुनिया में बादशाही कीतिरी निगाह में क़ुरआन-ओ-दीद का आलमतिरा ख़याल था राज़-ए-हयात का महरमहर एक गुल पे टपकती थी प्यार की शबनमकि बस गया था नज़र में बहिश्त का मौसमनफ़स नफ़स में कली रंग-ओ-बू की ढलती थीनसीम थी कि फ़रिश्तों की साँस चलती थीतिरी शराब से बाबा फ़रीद थे सरशारतिरे ख़ुलूस से बे-ख़ुद थे सूफ़ियान-ए-किबारकहाँ कहाँ नहीं पहुँची तिरे क़दम की बहारतिरे अमल ने सँवारे जहान के किरदारतिरी निगाह ने सहबा-ए-आगही दे दीबशर के हाथ में क़िंदील-ए-ज़िंदगी दे दीतिरे पयाम से ऐसी की थी मसीहाईतिरे सुख़न में हबीब-ए-ख़ुदा की रानाईतिरे कलाम में गौतम का नूर-ए-दानाईतिरे तराने में मुरली का लहन-ए-यकताईहर एक नूर नज़र आया तेरे पैकर मेंतमाम निकहतें सिमटी हैं इक गुल-ए-तर मेंजहाँ जहाँ भी गया तू ने आगही बाँटीअँधेरी रात में चाहत की रौशनी बाँटीअता किया दिल-ए-बेदार ज़िंदगी बाँटीफ़साद-ओ-जंग की दुनिया में शांति बाँटीबहार आई खिली प्यार की कली हर सूतिरे नफ़स से नसीम-ए-सहर चली हर सूरज़ा-ए-हक़ को नजात-ए-बशर कहा तू नेतअ'ईनात-ए-ख़ुदी को ज़रर कहा तू नेवफ़ा-निगर को हक़ीक़त-निगर कहा तू नेज़ुहूर-ए-इश्क़ को सच्ची सहर कहा तू नेजहान-ए-इश्क़ में कुछ बेश-ओ-कम का फ़र्क़ न थातिरी निगाह में दैर-ओ-हरम का फ़र्क़ न थाबताया तू ने कि इरफ़ाँ से आश्ना होनाकभी न आशिक़-ए-दुनिया-ए-बे-वफ़ा होनाबदी से शाम-ओ-सहर जंग-आज़मा होनाख़ुदा से दूर न ऐ बंदा-ए-ख़ुदा होनानशे में दौलत-ओ-ज़र के न चूर हो जानाक़रीब आए जो दुनिया तो दूर हो जानाजो रूह बन के समा जाए हर रग-ओ-पै मेंतो फिर न शहद में लज़्ज़त न साग़र-ए-मय मेंवही है साज़ के पर्दे में लहन में लय मेंउसी की ज़ात की परछाइयाँ हर इक शय मेंन मौज है न सितारों की आब है कोईतजल्लियों के इधर आफ़्ताब है कोईअबद का नूर फ़राहम किया सहर के लिएदिया पयाम बहारों का दश्त-ओ-दर के लिएदिए जला दिए तारीक रहगुज़र के लिएजिया बशर के लिए जान दी बशर के लिएदुआ ये है कि रहे इश्क़ हश्र तक तेराज़मीं पे आम हो ये दर्द-ए-मुश्तरक तेराख़ुदा करे कि ज़माना सुने तिरी आवाज़हर इक जबीं को मयस्सर हो तेरा अक्स-ए-नियाज़जहाँ में आम हो तेरे ही प्यार का अंदाज़ख़ुलूस-ए-दिल से हो पूजा ख़ुलूस-ए-दिल से नमाज़तिरे पयाम की बरकत से नेक हो जाएँये इम्तियाज़ मिटें लोग एक हो जाएँ
जानते तो होगे तुमइतनी तेज़ बारिश मेंराब्ते नहीं रहतेनेटवर्क नईं मिलताफ़ोन की भी लाइनें बारिशों के पानी सेऐसे टूट जाती हैंजिस तरह मोहब्बत मेंबेवफ़ा की बातों सेदिल ही टूट जाए तोराब्ते नहीं रहते
भूलना था तो ये इक़रार किया ही क्यों थाबे-वफ़ा तू ने मुझे प्यार किया ही क्यों थासिर्फ़ दो चार सवालात का मौक़ा' दे दे
मेरी महबूब ये तौहीन-ए-मोहब्बत होगीबेवफ़ा कह के मिरे प्यार को मजरूह न करतुझ को शिकवा है शिकायत है गिला है मुझ सेमेरी क़िस्मत की तरह तू भी ख़फ़ा है मुझ सेतेरी हर बात है तस्लीममगर कहने देदौर-ए-सरमाया कीरौंदी हुई इक लाश हमज़ुल्म की आग मेंमासूम मोहब्बत झुलसेइस से बेहतर है किबेगाना बना लें ख़ुद कोलफ़्ज़-दर-लफ़्ज़हिकायात में खो जाएँ हमकपकपाते हुए होंटों पे तबस्सुम रख लेंटिमटिमाती हुई आँखों में तजल्ली भर लेंअस्र-ए-हाज़िर कातक़ाज़ा भी यही है हमदमअपनी बेगानगी कोअपना मुक़द्दर समझेंतू मुक़द्दस हैतिरे गिर्द तक़द्दुस का हिसारमैं किइस अहद काइक शायर-ए-आशुफ़्ता-मिज़ाजमेरे हिस्से मेंफ़क़तनज़्म ग़ज़ल और अशआ'रमैं बहर-हालतिरे शौक़ का सामान नहींमेरी आँखों में हैं टूटे हुएलफ़्ज़ों के नुक़ूशमेरे होंटों पे हैंबिखरे हुए माज़ी के हुरूफ़सच तो ये है कि मिरा तुझ से कोई मेल नहींइश्क़ मेराज-ए-मुक़द्दर है कोई खेल नहीं
अब के बिछड़ना अलमनाक होगाकई गुज़रे सानेहों की तरहआओ तुम्हें एक नौहा सुना दूँजो इश्क़ की हिकायत हैजो दास्तान बनेगीउन बेवफ़ा दहकती गलियों में
भूल जाऊँगा कि तुम ने कभी चाहा था मुझेभूल जाऊँगा कि तुम मुझ पे फ़िदा रहते थेतुम तड़प उठते थे हल्की सी उदासी पे मिरीमेहरबाँ मुझ पे सदा बन के ख़ुदा रहते थेटूट कर चाहना सीखा है तिरी आँखों सेभूल जाने की अदाएँ भी सिखा दे मुझ कोमैं मोहब्बत का पुजारी हूँ वफ़ा का शैदाबे-वफ़ा कैसे बनूँ ये तो बता दे मुझ को
दम-ए-उम्र-ए-रवाँ का दायरारुकता है इक लम्हे पे शायद हर बरसवो मेरी पैदाइश की साअ'त हैतुम्हारी या हमारे नन्हे बच्चों कीहमारे रिश्ता-ए-इंदराज मेंया शो'ला-ए-गुल सेमुनव्वर ग़ैर-रस्मी अजनबी वाबस्तगी कीजो रग-ओ-पै में मुसलसल हो गईमैं रोकता हूँ बेवफ़ा लम्हे कोपैहम सींचता हूँ ख़ून से इस कोदरीदा उँगलियों सेकाट कर उस को खिलाता हूँ मैं दिल का ख़ोशा-ए-नाज़ुकमगर ये ताइर-ए-रा'नापरेशाँ फ़ासलों के नूर का रसियाज़मीनों आसमानों और ख़लाओंसे भी शायद मावरा हैमुख़्तसर से जश्न पर हँसता हुआहर सरहद-ए-इम्काँ से मेरी तीरगी सेदूर जाता हैफ़लक की रौशनी कीवादियों मेंमुंतज़िर हैकोई अन-जाना अनोखा ख़ूबसूरत अजनबी उस का
मिरी जान हो कि मिरा बदनतिरा जल्वा-गाह है ऐ वतनतिरी ख़ाक उन का ख़मीर हैमिरे ख़ून में ये झलक तिरीमिरी नब्ज़ में ये चिपक तिरीमिरी साँस तिरी सफ़ीर हैतिरी ख़ाक जग का ख़ुलासा हैतेरा हुस्न एक तमाशा हैतिरी फैली गोद कि बाग़ हैतिरी ख़ाक-ए-पाक ज़लील हैतो गु़लामियों की दलील हैतिरी पौद शर्म का दाग़ हैतुझे मा-सिवा से गिरा दियाहमें मा-सिवा ने मिटा दियाहुए तफ़रक़ों से तमाम हमतुझे जब तलक कि भुला रखाहमें वक़्त ने भी मिटा रखाबने घर में अपने ग़ुलाम हमतिरे ख़ून हैं ये फटे फटेतिरे पूत हैं ये बटे बटेतिरे दिल जिगर हैं ये बे-वफ़ातिरा कुछ लहू ही सफ़ेद हैकि अजब तरह का ये भेद हैनहीं भाई भाई से आश्नानहीं ग़ैर का हमें कुछ गिलाकि गु़लामियों का ये फल मिलाहमें तफ़रक़े के जुनून सेतिरे दूध में मिरी प्यारी माँनहीं दर्द की कोई बिजलियाँकि मिला दे ख़ून को ख़ून सेहमें भाइयों से ग़ुरूर हैंतिरे जहल-ओ-वहम में चूर हैंकि जो काम हैं सो ख़ता के हैंकहीं ज़ात-पात की लाग हैकहीं दीन-धर्म की आग हैकहीं बैर मुफ़्त ख़ुदा के हैंजिन्हें पीत है उन्हें जीत हैयही जग में जीत की रीत हैतिरे पूत अपनों से ग़ैर हैंहमें ग़ैरियत ये मिटानी हैहमें जीत आप पे पानी हैउसी घर के ग़ैर से ग़ैर हैंतिरे पूत भाई हैं भाई हूँतिरे दिल से सब ही फ़िदाई रहूँकि तू आप अपनी मिसाल होतिरे ज़ोर की यही धाक होकि जहाँ बुराई से पाक होतिरा इल्म हक़ का कमाल हो
अनोखा और नया ग़म शर्त है कोईतुम्हारे ख़ुद-कुशी करने कीतो फिर भूल जाओयहाँ तो बस वही ग़म हैंपुराने ग़मकि जिन से काम ये दुनिया चलाती आ रही हैमगर तुम हो कि हँस देते हो उन परअगर ये ग़म तुम्हें ग़म ही नहीं लगतेकि महबूबा तुम्हारी बेवफ़ा हैकि वो बच्चाछटी जिस की मनाना थी तुम्हें आजनाक में है ऑक्सीजन ट्यूब उस केतो फिर ये गोलियाँ सल्फ़ास की बे-कार में तुम जेब में रक्खे हुए होइन्हें जा कर उसी कठिया में रख आओकि जिस में कल ही तुम ने साल भर के वास्ते गेहूँ भरा है
जिस जगह की हो बेवफ़ा मिट्टीउस जगह से मिरी उठा मिट्टीएक दिन ख़ुद-ब-ख़ुद ये होना हैतो तू मिट्टी में मत मिला मिट्टीजाने किस किस तरह मिले बिछड़ेआग पानी फ़लक हवा मिट्टीरंग और नस्ल की तमीज़ ग़लतआदमी अस्ल में है क्या मिट्टीहम सदा जाँ पे खेल जाते हैंहम को देती है जब सदा मिट्टीसज्दा करने को दिल तरसता हैला वतन की वतन से ला मिट्टीकैसी मुर्दा-परस्त है दुनियामर के पाती है मर्तबा मिट्टीसब पे हक़ उस का सब पे क़र्ज़ उस काजाने कब किस को ले बुला मिट्टीरोती हँसती है चलती फिरती हैकितने रंगों में जा-ब-जा मिट्टीरौंदता है कुम्हार मिट्टी कोउस को रौंदेगी देखना मिट्टीजिस को हम ने अज़ीज़-तर जानासब से पहले वो दे गया मिट्टीअपने अंदर छुपाए बैठी हैसारी दुनिया का फ़ल्सफ़ा मिट्टीये कहीं पर है ढेर बे-मा'नीऔर कहीं पर है कीमिया मिट्टी
ब-ज़ाहिर ये लगता हैउस मल्गजी सुब्ह को सब सहारों ने जैसेअचानक तिरा साथ छोड़ासहर ने ज़मीं पर क़दम जब रखातो अचानक ज़मीं बेवफ़ा हो गईउभरता हुआ आफ़्ताबएक ही ना-गहाँ लग़्ज़िश-ए-पा से यूँ लड़खड़ायाकि मग़रिब के पाताल में मुँह के बल जा समायाअचानक फ़रिश्ते कफ़न साएबाँ की तरह तान करआसमानों से उतरेगुलों की महक की जगह दफ़अतन बू-ए-काफ़ूर की सर्द-मेहरी ने ले लीशजर के बदन से नई कोंपलों की बजाए ख़िज़ाँ फूट निकलीब-ज़ाहिर ये लगता हैलेकिन भला हादसा एक-दम कब हुआ हैबहुत दिन से इस सर-ब-महर आतिशीं राज़ का गुंग फ़ीताख़मोशी से जलता चला जा रहा थाफ़ना के गरजते हुए आबशारों के ऊपर तनारस्सियों का ये पुलएक मुद्दत से गलता जा रहा था
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