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नज़्म
क्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूर
शिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
गुमाँ ये है कि शायद बहर से ख़ारिज नहीं हूँ मैं
ज़रा भी हाल के आहंग में हारिज नहीं हूँ
जौन एलिया
नज़्म
मैं शाइ'र हूँ जो कि फ़ऊलुन फ़ऊलुन से बहर-ए-रमल तक
हर इक नग़मगी का मुकम्मल ख़ुदा हूँ
सोहैब मुग़ीरा सिद्दीक़ी
नज़्म
और इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दर
अजनबी क़ौम के ज़ुल्मत-अफ़्शाँ फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
अभी चमकने वाली है छुपी हुई हक़ीक़तें
अभी तो बहर-ओ-बर पे सो रही हैं मेरी वो सदाएँ