aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "daa.em"
मिरे होंटों पे उस के आख़िरी बोसे की लज़्ज़त सब्त हैवो उस का आख़िरी बोसाजो मुस्तक़बिल के हर इक ख़ौफ़ से आज़ादइक रौशन सितारा थागुज़रती रात के नंगे बदन पर तिल की सूरत क़ाएम-ओ-दाएमहमेशा जागने वाला सितारामैं जिसे इस आग बरसाते हुए सूरज के आगेजगमगाता देख सकता हूँ
टूटे हुए दिलों को जोड़े रफ़ूगरी सेजोड़े तमाम गिर्हें जज़्बों की सादगी सेरह जाएँ दोस्त बन कर आएँ जो अजनबी सेदाएम मोहब्बतों के आब-ए-रवाँ का जादू
उम्र सिर्फ़ मोहलत हैइश्क़ लम्हा-ए-दाएमए'तिबार बाक़ी हैमेरा ग़म सलामत हैतेरा हुस्न है क़ाएमइंतिज़ार बाक़ी है
मिरा सर तुम अपने ही ज़ानू पे रख करमुझे पूछती हो!कि में कौन हूँक्या हूँ, कैसे हूँ?सारे सवालों को मुट्ठी में रख करज़रा मेरी इक बात सन लोसुनो! ये तुम्हारे बदन का ख़ुमार-आश्ना कैफ़... नर्म ओ मुसलसलमुझे लज़्ज़तों के उमुक़ में लिए जा रहा हैमैं पल पल कभीलहज़ा लहज़ा कभीधीरे धीरे कभीलम्हा लम्हा कभीएक दरिया के फैलाव में डूबता जा रहा हूँशराबोर तूफ़ान में तुंद लहरों की सूरतनशीले समयएक आहंग के साथ हचकोले खाता हुआमैं किसी सोच की रौ में बहता चला जा रहा हूँमिरा दिल, मिरी जाँ:दोनों ही मौसूम हैं, उस तमव्वुज सेजो मेरी नस नस में पैहम मचलता हुआख़ून के ज़ेर-ओ-बम की कहानी सुनाता हुआबह रहा हैकि जिस के हर एक लम्स कीलज़्ज़तों, ज़ाइक़ों मेंतुम्हारा कोई ख़्वाब हैजैसे महताब हैतुम तो मेरे बदन का कोई पारा-ए-ख़ाक होतुम कोई ग़ैर हो?मेरी हम-ज़ाद!हम कश्ती-ए-ज़ीस्त के बादबाँ की तनाबें हैं दोएक तुम, एक मैंजिन का मोहताज है बादबान-ए-नफ़सये ज़मीं, ये ज़माँमेरे ही अहद की दास्ताँहम से आबाद दाएम बिसात-ए-जहाँअपने आँगन की फूलों-भरी कियारियाँ
नया साल तुम को मुबारक हो बच्चोसदा ख़ुश रहो तुम फलो और फूलोख़ुदा की इनायत रहे तुम पे दाएमहमेशा रहो सीधे रस्ते पे क़ाएमतरक़्क़ी करो इल्म में और हुनर मेंबुलंदी हो पैदा तुम्हारी नज़र मेंग़रीबों की इमदाद करते रहो तुमदम उन की मोहब्बत का भरते रहो तुमरहो तुम हमेशा क़वी और तवानाज़माना पुकारे तुम्हें कह के दानाजो बिगड़े भी हों काम उन को सँभालोकभी आज का काम कल पर न टालोबनो नेक नेकी तुम्हारा चलन होभलाई की धुन में हमेशा मगन होरहो सुख से दाएम न दुख पास आएख़ुदा तुम को बीमारियों से बचाएदुआ है ये 'नय्यर' की तुम नाम पाओऔर इस साल में कुछ न कुछ कर दिखाओ
बरसों बाद बर-नोक-ए-ज़बान रहता है कोई शेरफिर एक दिनउस के जाने पहचाने हज़ार मर्तबा दोहराए हुए अल्फ़ाज़ के अंदरखुल जाता है मआनी का एक नया दरवाज़ाऔर रह जाते हैं हम हक्का-बक्काजिस मफ़्हूम पर सर धुनते आए थे कल तक कितना सतही कितना अधूरा था वोशुक्र करते हैं कि नहीं पूछ लिया किसी ने हम से इस शेर का मतलबसत्य-नास कर डालते अच्छे भले शेर का इन नए मआनी के बग़ैर हमयही कुछ होता है ज़िंदगी में पेश आने वालेवाक़िआत ओ हादसात के साथ भीजो कुछ बीत गया और बीत रहा है हम परदेर तक राज़ ही नहीं खुलता उस की अहमियत काबे-मक़्सद हो रहा है ये सब कुछया इस का हमारे मुस्तक़बिल और मुक़द्दर से भी तअल्लुक़ है कुछफिर पर्दा सा हटता है और हो जाते हैं हम ग़र्क़-ए-हैरतकितना महदूद था हमारा नक़्द-ए-इल्मऔर किन मुग़ालितों में पड़े हुए थे हममुझे तो ख़ूगर सा बना दिया है रोज़-मर्रा की इस हैरानी ओ परेशानी नेनए से नया सदमा सहने को तय्यार रहता हूँ सुब्ह ओ शामअपनी जहालत के इंकिशाफ़ परवनडे क्रिकेट तो शौक़ से देखते हैं आप भीयूँ समझिए कि मश्क़ था गुज़िश्ता कल का मैच आज के मैच कीमश्क़ है आज का मैच आने वाले कल के लिएऔर कल जो मैच होगा अपनी जगह वो फाईनल ही क्यूँ न होमश्क़ होगा परसों के मैच कीहड्डियाँ गल गईं इतनी सादा सी बात समझते समझतेकि हर दिन तुलूअ होता है अपने साथ एक नया सवाल एक नया चैलन्ज ले करऔर मुतालिबा करता है हम से एक नए जवाब एक नए तर्ज़-ए-अमल कान तो ज़िंदगी ही जामिद है न ज़िंदगी का ख़ालिक़ ख़ुदाज़िंदगी बहते दरिया की तरह बदलती रहती है हर लहज़ा क़ाएम-ओ-दाएम रहते हुएऔर नित-नई तख़्लीक़ में मसरूफ़ ख़ुदा भी नहीं होता कभी पहले वाला ख़ुदाजब ज़िंदगी और उस के ख़ालिक़ ही की काया कल्प होती रहती है यूँतो अशआर हों या वाक़िआत ओ हादसात बदल जाता है हिर शय का मफ़्हूमभई, बदल जाते हैं हम ख़ुद बदल जाती है हमारी नज़र हमारा एहसासबदल जाती हैं वो मोहब्बतेंजिन के अज़ली ओ अबदी होने की क़समें खाया करते थे हमबदल जाती हैं बे-बदल दोस्तियाँवो ख़्वाहिशें बदल जाती हैं जिन्हों नेएक उम्र पागल बनाए रखा होता है हमेंऔर तो और बदल जाते हैं दीन और ईमानरास्ते ही नहीं बदल जाती हैं मंज़िलेंसुन रहे हैं आपभर तो नहीं पाए आप भी?किधर चल दिए आप?बदल तो नहीं गए आप भी?
ये प्यारी उर्दू कि जिस का नहीं है कोई बदलहसीन ऐसी है जैसे जमाल-ए-ताज-महलहर एक देस-निवासी ने पाई ये मीरासवो राम हो कि करम सिंह हो या कि मीर-ग़ियासहै मस्जिदों में मुक़द्दस पवित्र मंदिर मेंहर इक गली में चलन और गुज़र है हर घर मेंवो जो कि बोलते हैं भाँत भाँत की बोलीतो सुनिए उन से भी उर्दू जम्अ' हो जब टोलीकहीं भी जाइए उर्दू ज़रूर पाएँगेसमझने बोलने वाले तो मिल ही जाएँगेअदब में शेर में ऊँचा मक़ाम है इस कासमाज के सभी शोबों में नाम है इस काज़वाल इस को कभी आए ग़ैर मुमकिन हैदिलों से महव ये हो जाए ग़ैर मुमकिन हैहै इस के नूर से रौशन समाज की दुनियाइसी के दम से है आबाद राज की दुनियारहेगा क़ाएम-ओ-दाएम मुदाम दुनिया मेंचलेगा सिक्का-ए-उर्दू तमाम दुनिया मेंजो ज़िंदा रहने को आए वो कैसे हो बर्बाद'असद' लगाओ ये ना'रा कि उर्दू ज़िंदाबाद
हमारे दिल में तुम्हारी ख़ातिरमोहब्बतें थीं अज़ल से ज़िंदा अबद से क़ाएमतुम्हारा हाथों में हाथ ले कर वो चूम लेना सब्त करना वो लब मुलाएमतुम्हारे 'इश्क़ की ही मानिंदतुम्हारा दुख भी हमारे दिल पर रहा था दाएमआह यक-दम बे-रुख़ी सेवो हाथ छोड़े तुम्हारा जानाऔर रस्तों में धूल बन कर मिरा बिखरनातुम्हें बुलानावो धूल होना वो धूल उड़ानावो तपते सहरा की रेत पर यूँपटख़ के सर को मलूल होनावो रोते रोते सदा लगाना तुम्हें बतानाकि अब तलक बे-अमान रस्तोंपे सर्द रातों की धुंद में लिपटीइक सिसकती सी याद ले करतुम्हारे वा'दों के आसरे परवो सारे वा'दे जो झूट निकलेमुझे अभी तक गुमान क्यों है कि सच थे शायद कभी बताओ वो झूट थे नाँवहीं खड़ी है 'कँवल' तुम्हारीजहाँ से तुम ने बदल के रस्तापलट के इक बार भी न देखाजहाँ सुलगती सी रेत पर मैंधूप आँचल को सर पे ओढ़ेजुलाई की झुलसाती लू मेंख़ुश्क सूखे हुए लबों परकर्बला सी वो प्यास ले कर मैं तीन दिन से वहीं खड़ी थीये पूछने को कि उस शाम ऐसा क्या हुआ था ख़िलाफ़-ए-वा'दा जो तुम न आएतुम्हें पता था ख़बर थी तुम कोतुम्हें गवारा नहीं था लेकिनकि पास आते मुझे बताते कि ऐसे जाने का क्या सबब था बिना बताएलाल रंग का पहन के जोड़ालगा के मेहंदी सजा के ख़ुद कोमैं कितने घंटों से मुंतज़िर थी मगर वो गर्मी की शाम हाएख़िलाफ़-ए-वा'दा जो तुम न आएकि मैं तो उस शाम ही मर गई थीकभी तो आते मुझे बताते कि क्यों गए होफ़क़त ये कहते कि मु'आफ़ कर दोकोई भी सिक्का वफ़ा का चाहे हमारे कासे में तुम न भरते फ़क़त बताते कि उन दरिंदों के बीच मुझ सी वो नर्म-ओ-नाज़ुक अकेली लड़की कि जो परिंदों के फड़फड़ाने से ख़ौफ़ खाती जो ऊँची आवाज़ों से डर कर सहम सी जातीजो जानती ही नहीं थी दुनिया तुम्हारे जैसे भेड़ियों से भरी हुई हैतो आज सुन लोहमारे दिल में तुम्हारी ख़ातिरमोहब्बतों का वो बाब जो था अज़ल से ज़िंदा अबद से क़ाएमतमाम नफ़रत में ढल चुका हैजहाँ खिले थे गुलाब सारेवो बाग़ चाहत का जल चुका हैवो राह तकती 'कँवल' की आँखें भी बुझ चुकी हैंऔर उस का दिल भी बदल चुका हैअब उस के दिल में तुम्हारी ख़ातिरतमाम नफ़रत तमाम नफ़रत तमाम नफ़रतऔर नफ़रत के 'अलावा तो कुछ नहीं हैनहीं है कुछ भीउसे बतानाउसे जलाना उसे रुलानानहीं नहीं ये नहीं है मुमकिन हाँ फिर भी लेकिनवो आँखें मीचे मलाल हो कर'अजीब ग़म से निढाल हो करतो मत बताना कि नज़्म का 'उन्वान क्या थाझूटी नफ़रत
जिन के फेरे थे खंडर में इन हवाओं ने कहावक़्त की रफ़्तार का अंजाम वीरानी है क्योंइस पे बोली गर्द हैं इस मसअले के रुख़ कईइक यही पहलू भला वज्ह-ए-परेशानी है क्योंमेरे बारे में भी सोचो वक़्त ठहरे या चलेक़ाएम-ओ-दाएम हमेशा मेरी यकसानी है क्यों
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहींतोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहींआज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलोदस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलोख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलोराह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलोहाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भीतीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भीसुब्ह-ए-नाशाद भी रोज़-ए-नाकाम भीउन का दम-साज़ अपने सिवा कौन हैशहर-ए-जानाँ में अब बा-सफ़ा कौन हैदस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है
रास्ते में रुक के दम ले लूँ मिरी आदत नहींलौट कर वापस चला जाऊँ मिरी फ़ितरत नहींऔर कोई हम-नवा मिल जाए ये क़िस्मत नहींऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रबक्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया होशोरिश से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेराऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा होमरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरीदामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा होआज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँदुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया होलज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों मेंचश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा होगुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी कासाग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा होहो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौनाशरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा होमानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुलनन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा होसफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे होंनद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा होहो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारापानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता होआग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ाफिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा होपानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनीजैसे हसीन कोई आईना देखता होमेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन कोसुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा होरातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दमउम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया होबिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा देजब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ होपिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िनमैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा होकानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँरौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा होफूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू करानेरोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ होइस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नालेतारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा होहर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला देबेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे
ब-हाल-ए-ना-शिता सद-ज़ख़्म-हा ओ ख़ून-हा ख़ूर्दमब-हर-दम शूकराँ आमेख़्ता माजून-हा ख़ूर्दमतुम्हें इस बात से मतलब ही क्या और आख़िरश क्यूँ होकिसी से भी नहीं मुझ को गिला और आख़िरश क्यूँ होजो है इक नंग-ए-हस्ती उस को तुम क्या जान भी लोगेअगर तुम देख लो मुझ को तो क्या पहचान भी लोगे
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हमऔर कुछ देर सितम सह लें तड़प लें रो लेंअपने अज्दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
हर दम अबदी राहत का समाँ दिखला के हमें दिल-गीर न करलिल्लाह हबाब-ए-आब-ए-रवाँ पर नक़्श-ए-बक़ा तहरीर न करमायूसी के रमते बादल पर उम्मीद के घर तामीर न कर
मिरा क़लम नहीं तस्बीह उस मोबल्लिग़ कीजो बंदगी का भी हर दम हिसाब रखता हैमिरा क़लम नहीं मीज़ान ऐसे आदिल कीजो अपने चेहरे पे दोहरा नक़ाब रखता है
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमाराहम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमाराग़ुर्बत में हों अगर हम रहता है दिल वतन मेंसमझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारापर्बत वो सब से ऊँचा हम-साया आसमाँ कावो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारागोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदियाँगुलशन है जिन के दम से रश्क-ए-जिनाँ हमाराऐ आब-रूद-ए-गंगा वो दिन है याद तुझ कोउतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारामज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखनाहिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारायूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ सेअब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमाराकुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारीसदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा'इक़बाल' कोई महरम अपना नहीं जहाँ मेंमालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरीज़िंदगी शम्अ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी!दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए!हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए!हो मिरे दम से यूँही मेरे वतन की ज़ीनतजिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़मानावो बाग़ की बहारें वो सब का चहचहानाआज़ादियाँ कहाँ वो अब अपने घोंसले कीअपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जानालगती है चोट दिल पर आता है याद जिस दमशबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुरानावो प्यारी प्यारी सूरत वो कामनी सी मूरतआबाद जिस के दम से था मेरा आशियानाआती नहीं सदाएँ उस की मिरे क़फ़स मेंहोती मिरी रिहाई ऐ काश मेरे बस में
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