aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "daa.ntaa"
क्या ज़िंदगी हमारीसब कुछ है अपने बस मेंआज़ाद हैं फ़ज़ाएँदुनिया है दस्तरस मेंक्या क्या हमें मिला हैकुछ वक़्त कुछ बरस मेंलेकिन जो मुड़ के देखेंथी इक अजब कहानीदुश्वार कैसा जीनामुश्किल थी ज़िंदगानीइक आफ़त-ए-मुसलसलआलाम-ए-ना-गहानीरोज़ाना सुब्ह उठनाआसान था न इतनाहर रोज़ डाँट खानाहर रोज़ का सिसकनाहर बात के तमाशेहर बात पर झगड़नाअब्बा वहीं खड़े हैंअख़बार पढ़ रहे हैंक्या काम हम को दे देंहर वक़्त सोचते हैंऔलाद को तो अपनीनौकर समझ रहे हैंअम्मी के सामने तोबिल्कुल न मुँह को खोलेंहम बद-तमीज़ ठहरेगो अच्छी बात बोलेंचुप-चाप ही रहें बसकितना भी ख़्वार हो लेंपानी बरस रहा हैपर दिल तरस रहा हैवो साइकल खड़ी हैमाँझा वहीं रखा हैकंचे यहाँ पड़े हैंबल्ला वहाँ खड़ा हैलेकिन नहीं हमें क्यालादे कमर पे बस्तास्कूल जा रहे हैंतारीख़ का है परचाअच्छा नहीं हुआ तोबस बंद जेब ख़र्चाउर्दू का काम पूराकल रात कर लिया थालेकिन हमें रियाज़ीबिल्कुल समझ न आयाअल्लाह के हैं बंदेहम से है वास्ता क्याअम्मी ने सिर्फ़ डाँटाबालों में तेल डालाभय्या ने सिर्फ़ झिड़काबाजी ने ख़ूब टालासब के लिए है जी मेंनफ़रत का एक जालाभय्या की साइकल कीकिस ने हवा निकालीहम को भला ख़बर क्याहर शख़्स है सवालीउस ने हमारी चिड़ियाउस दिन जो तोड़ डालीसच है बहुत सितम थागोया थे इक खिलौनाजैसे हो सब बराबरघर में न होना होनादेखा नहीं किसी नेछुप छुप हमारा रोनाअब हो गया है अपना हर चीज़ पर इजारासब अपनी ज़िम्मेदारीसब फ़ैसले हमारेहर चीज़ इख़्तियारीलेकिन वो बचपने की है याद प्यारी प्यारीक्या ज़िंदगी हमारीक्या ज़िंदगी हमारी
इक बूढ़ा बिस्तर-ए-मर्ग पे हैबीमार बदन लाचार बदनसाँसें भी कुछ बोझल सी हैंऔर आँखें भी जल-थल सी हैंऐसा भी नहीं तन्हा है वोपानी है मगर प्यासा है वोघर में बहुएँ बेटे भी हैंहैं पोतियाँ भी पोते भी हैंलेकिन कोई पास नहीं आतासब झाँकते हैं चले जाते हैंजैसे ये इस का घर ही नहींजैसे वो सब बेगाने हैंजिस बहू का नंबर होता हैखाने के निवाले ठूँस के वोफ़र्ज़ अपना मुकम्मल करती हैफिर वक़्त पे कोई इक बेटावो जिस को थोड़ी फ़ुर्सत होपहले तो आ कर डाँटता हैदेता है दवाई फिर ऐसेजैसे एहसान करे कोईजैसे अपमान करे कोईहर दिन ये बूढ़ा सोचता हैकोई बात नई हो आज के दिनकोई दो मीठे अल्फ़ाज़ कहेकभी महफ़िल उस के पास सजेकभी हँसने की कोई बात चलेमगर ऐसा पिछले बरसों मेंकभी हो पाया नहीं हो पायाअपने उस बेगाने-पन परअपने उस वीराने-पन परये बूढ़ा इंकिशाफ़ रहता हैये बूढ़ा रोता रहता हैइक बूढ़ा बिस्तर-ए-मर्ग पे है
चाँद ने मुझ से कहा ऐ शायर-ए-फ़िक्र-ए-अज़लमेरे बारे में भी लिख दे कोई संजीदा ग़ज़लहर तअल्लुक़ तोड़ रक्खा है हिलाल-ए-ईद सेतुझ को फ़ुर्सत ही नहीं है मह-वशों की दीद सेरस्म-ए-दीदार-ए-हिलाल-ए-ईद, अफ़्साना हुईबाम पर उस दम चढ़े, जिस वक़्त फ़रज़ाना हुईले के नज़राना कमेटी ने उजाला है मुझेगर नहीं निकला, ज़बरदस्ती निकाला है मुझेमें जो बे-मर्ज़ी निकल आया तो डाँटा है बहुतमौलवी ने मुख़्तलिफ़ ख़ानों में बाँटा है बहुतइस को मत फॉलो करो, इस की तरीक़त माँद हैतुम बरेली के हो और ये देवबंदी चाँद हैये जो ख़ूँ-आलूद है, अफ़्ग़ानियों का चाँद हैमुख़्तलिफ़ टुकड़ों में पाकिस्तानीयों का चाँद हैइक कराची से है निकला इक पस-ए-लाहौर हैसिंध का चाँद और है पंजाब का चाँद और हैवो जो हम-साए की बीवी है ग़ज़ाला चाँद हैऔर उस के साथ जो रहता है काला चाँद हैशायरों ने अपने शेरों में बहुत पेला मुझे'मीर' ओ 'ग़ालिब' ने भी समझा ख़ाक का ढेला मुझेशेर में, रश्क-ए-क़मर लैला को फ़रमाने लगेट्यूब-लाईट को हिलाल-ए-ईद बतलाने लगेअपनी बीवी से कहा उनत्तीसवीं का चाँद होऔर पड़ोसन से कहा तुम चौदहवीं का चाँद होआम सी औरत को मह-पारा बना कर रख दियाचाँद को टूटा हुआ तारा बना कर रख दियाचाँद पर जिस दिन से इंसाँ के क़दम पड़ने लगेचाँदनी जिन से हो ऐसे बल्ब कम पड़ने लगेमैं ज़मीं से दूर हूँ लेकिन बहुत नज़दीक हूँऐ ज़मीं वालो मैं तुम से दूर रह कर ठीक हूँमैं ज़मीं पर आ गया तो हर बशर ले जाएगासब से पहले टेन-परसेंट अपने घर ले जाएगा
दुल्हन गंजी है दुल्हन गंजी हैलड़कियाँ तालियाँ बजाते हुए बोलींऔर देर तक ज़ोर ज़ोर से हँसती रहींकुछ औरतों ने उन्हें आहिस्ता से डाँटाऔर दुल्हन के पास जा के उसे चुप कराने लगींवो रो रही थीउस दिन से ले कर पूरे तीन बरस तक वोआहिस्ता आहिस्ता खाँसते खाँसते और रोते रोते मर गईउस की बेटी अब सोला बरस की हैज़मीन को छूते हुए उस केसियाह रेशमी बाल सब को हैरान करते हैंउन लड़कियों को भी जो अपने बालों भरेसफ़ेद सर की वजह सेअब दुल्हन नहीं बन सकेंगी
वो इक पेड़ जो इस 'इलाक़े की सब से बड़ी शख़्सियत थाअपने चारों तरफ़ के मकानों को जिस नेथाम कर उंगली चलना सिखायाउसे सब ख़बर थीकि किस घर में किस की लड़ाई हुई हैमगर चुप रहाऔर हर घर के हर राज़ को उस ने सब से छुपायाकच्ची दीवारें अक्सरकोठरी की शिकायत जो करती थीं उस सेतो उन को बिठा करप्यार से मुस्कुरा करज़रा डाँटता थासद्र दरवाज़ों कासारे दालानों से फ़ासला था मगरचँद झोंकों से वो फ़ासला पाटता थावही पेड़ अब सर झुकाए खड़ा हैकच्ची दीवारों के छोटे छोटे मकाँपक्की ईंटों के दो-मंज़िले हो गए हैंपेड़ ख़ामोश हैवो मकाँ उस के हिस्से की धूपों को घेरे खड़े हैं
चूहे ने बिल्ली को दौड़ायाभाग के मेरे हैट में आईच्यूँटी ने डाँटा हाथी कोबोला हम भी हैं भाईकुत्ता बोला चूँ चूँ चूँचिड़िया बोली भौं भौं भौं भौंसात समुंदर हैट के अंदरडॉलफ़िन ने ग़ज़ल सुनाईआओ भाई हैट में आओसब प्राणी हैं भाई भाई
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
तुम्हारे रंग मुझ में और गहरे होते जाते हैंमैं डरता हूँ
मिरा क़लम नहीं औज़ार उस नक़ब-ज़न काजो अपने घर की ही छत में शिगाफ़ डालता हैमिरा क़लम नहीं उस दुज़द-ए-नीम-शब का रफ़ीक़जो बे-चराग़ घरों पर कमंद उछालता है
फ़लक का तुझे शामियाना दियाज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता हैसुना है शेर का जब पेट भर जाए तो वो हमला नहीं करतादरख़्तों की घनी छाँव में जा कर लेट जाता हैहवा के तेज़ झोंके जब दरख़्तों को हिलाते हैंतो मैना अपने बच्चे छोड़ करकव्वे के अंडों को परों से थाम लेती हैसुना है घोंसले से कोई बच्चा गिर पड़े तो सारा जंगल जाग जाता हैसुना है जब किसी नद्दी के पानी मेंबए के घोंसले का गंदुमी साया लरज़ता हैतो नद्दी की रुपहली मछलियाँ उस को पड़ोसन मान लेती हैंकभी तूफ़ान आ जाए, कोई पुल टूट जाए तोकिसी लकड़ी के तख़्ते परगिलहरी, साँप, बकरी और चीता साथ होते हैंसुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता हैख़ुदावंदा! जलील ओ मो'तबर! दाना ओ बीना मुंसिफ़ ओ अकबर!मिरे इस शह्र में अब जंगलों ही का कोई क़ानून नाफ़िज़ कर!कोई दस्तूर नाफ़िज़ कर
हर मंज़िल में अब साथ तिरे ये जितना डेरा-डांडा हैज़र दाम-दिरम का भांडा है बंदूक़ सिपर और खांडा हैजब नायक तन का निकल गया जो मुल्कों मुल्कों हांडा हैफिर हांडा है न भांडा है न हल्वा है न मांडा हैसब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
तुम ने जिस ख़ून को मक़्तल में दबाना चाहाआज वो कूचा ओ बाज़ार में आ निकला हैकहीं शोला कहीं नारा कहीं पत्थर बन करख़ून चलता है तो रुकता नहीं संगीनों सेसर उठाता है तो दबता नहीं आईनों से
मैं जब भीज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तप करमैं जब भीदूसरों के और अपने झूट से थक करमैं सब से लड़ के ख़ुद से हार केजब भी उस एक कमरे में जाता थावो हल्के और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरावो बेहद मेहरबाँ कमराजो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता थाजैसे कोई माँबच्चे को आँचल में छुपा लेप्यार से डाँटेये क्या आदत हैजलती दोपहर में मारे मारे घूमते हो तुमवो कमरा याद आता हैदबीज़ और ख़ासा भारीकुछ ज़रा मुश्किल से खुलने वाला वो शीशम का दरवाज़ाकि जैसे कोई अक्खड़ बापअपने खुरदुरे सीने मेंशफ़क़त के समुंदर को छुपाए होवो कुर्सीऔर उस के साथ वो जुड़वाँ बहन उस कीवो दोनोंदोस्त थीं मेरीवो इक गुस्ताख़ मुँह-फट आईनाजो दिल का अच्छा थावो बे-हँगम सी अलमारीजो कोने में खड़ीइक बूढ़ी अन्ना की तरहआईने को तंबीह करती थीवो इक गुल-दाननन्हा साबहुत शैतानउन दिनों पे हँसता थादरीचाया ज़ेहानत से भरी इक मुस्कुराहटऔर दरीचे पर झुकी वो बेलकोई सब्ज़ सरगोशीकिताबेंताक़ में और शेल्फ़ परसंजीदा उस्तानी बनी बैठींमगर सब मुंतज़िर इस बात कीमैं उन से कुछ पूछूँसिरहानेनींद का साथीथकन का चारा-गरवो नर्म-दिल तकियामैं जिस की गोद में सर रख केछत को देखता थाछत की कड़ियों मेंन जाने कितने अफ़्सानों की कड़ियाँ थींवो छोटी मेज़ परऔर सामने दीवार परआवेज़ां तस्वीरेंमुझे अपनाइयत से और यक़ीं से देखती थींमुस्कुराती थींउन्हें शक भी नहीं थाएक दिनमैं उन को ऐसे छोड़ जाऊँगामैं इक दिन यूँ भी जाऊँगाकि फिर वापस न आऊँगा
इबलीसये अनासिर का पुराना खेल ये दुनिया-ए-दूँसाकिनान-ए-अर्श-ए-आज़म की तमन्नाओं का ख़ूँइस की बर्बादी पे आज आमादा है वो कारसाज़जिस ने इस का नाम रखा था जहान-ए-काफ़-अो-नूँमैं ने दिखलाया फ़रंगी को मुलूकियत का ख़्वाबमैं ने तोड़ा मस्जिद-ओ-दैर-ओ-कलीसा का फ़ुसूँमैं ने नादारों को सिखलाया सबक़ तक़दीर कामैं ने मुनइ'म को दिया सरमाया दारी का जुनूँकौन कर सकता है इस की आतिश-ए-सोज़ाँ को सर्दजिस के हंगामों में हो इबलीस का सोज़-ए-दरूँजिस की शाख़ें हों हमारी आबियारी से बुलंदकौन कर सकता है इस नख़्ल-ए-कुहन को सर-निगूँपहला मुशीरइस में क्या शक है कि मोहकम है ये इबलीसी निज़ामपुख़्ता-तर इस से हुए ख़ू-ए-ग़ुलामी में अवामहै अज़ल से इन ग़रीबों के मुक़द्दर में सुजूदइन की फ़ितरत का तक़ाज़ा है नमाज़-ए-बे-क़यामआरज़ू अव्वल तो पैदा हो नहीं सकती कहींहो कहीं पैदा तो मर जाती है या रहती है ख़ामये हमारी सई-ए-पैहम की करामत है कि आजसूफ़ी-ओ-मुल्ला मुलूकिय्यत के बंदे हैं तमामतब-ए-मशरिक़ के लिए मौज़ूँ यही अफ़यून थीवर्ना क़व्वाली से कुछ कम-तर नहीं इल्म-ए-कलामहै तवाफ़-ओ-हज का हंगामा अगर बाक़ी तो क्याकुंद हो कर रह गई मोमिन की तेग़-ए-बे-नियामकिस की नौ-मीदी पे हुज्जत है ये फ़रमान-ए-जदीदहै जिहाद इस दौर में मर्द-ए-मुसलमाँ पर हरामदूसरा मुशीरख़ैर है सुल्तानी-ए-जम्हूर का ग़ौग़ा कि शरतू जहाँ के ताज़ा फ़ित्नों से नहीं है बा-ख़बरपहला मुशीरहूँ मगर मेरी जहाँ-बीनी बताती है मुझेजो मुलूकियत का इक पर्दा हो क्या इस से ख़तरहम ने ख़ुद शाही को पहनाया है जमहूरी लिबासजब ज़रा आदम हुआ है ख़ुद-शनास-ओ-ख़ुद-निगरकारोबार-ए-शहरयारी की हक़ीक़त और हैये वजूद-ए-मीर-ओ-सुल्ताँ पर नहीं है मुनहसिरमज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार होहै वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़रतू ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जमहूरी निज़ामचेहरा रौशन अंदरूँ चंगेज़ से तारीक-तरतीसरा मुशीररूह-ए-सुल्तानी रहे बाक़ी तो फिर क्या इज़्तिराबहै मगर क्या इस यहूदी की शरारत का जवाबवो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीबनीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताबक्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़मश्रिक-ओ-मग़रिब की क़ौमों के लिए रोज़-ए-हिसाबइस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअ'त का फ़सादतोड़ दी बंदों ने आक़ाओं के ख़ेमों की तनाबचौथा मुशीरतोड़ इस का रुमत-उल-कुबरा के ऐवानों में देखआल-ए-सीज़र को दिखाया हम ने फिर सीज़र का ख़्वाबकौन बहर-ए-रुम की मौजों से है लिपटा हुआगाह बालद-चूँ-सनोबर गाह नालद-चूँ-रुबाबतीसरा मुशीरमैं तो इस की आक़िबत-बीनी का कुछ क़ाइल नहींजिस ने अफ़रंगी सियासत को क्या यूँ बे-हिजाबपाँचवाँ मुशीर इबलीस को मुख़ातब कर केऐ तिरे सोज़-ए-नफ़स से कार-ए-आलम उस्तुवारतू ने जब चाहा किया हर पर्दगी को आश्कारआब-ओ-गिल तेरी हरारत से जहान-ए-सोज़-अो-साज़़अब्लह-ए-जन्नत तिरी तालीम से दाना-ए-कारतुझ से बढ़ कर फ़ितरत-ए-आदम का वो महरम नहींसादा-दिल बंदों में जो मशहूर है पर्वरदिगारकाम था जिन का फ़क़त तक़्दीस-ओ-तस्बीह-ओ-तवाफ़तेरी ग़ैरत से अबद तक सर-निगूँ-ओ-शर्मसारगरचे हैं तेरे मुरीद अफ़रंग के साहिर तमामअब मुझे उन की फ़रासत पर नहीं है ए'तिबारवो यहूदी फ़ित्ना-गर वो रूह-ए-मज़दक का बुरूज़हर क़बा होने को है इस के जुनूँ से तार तारज़ाग़ दश्ती हो रहा है हम-सर-ए-शाहीन-अो-चर्ग़कितनी सुरअ'त से बदलता है मिज़ाज-ए-रोज़गारछा गई आशुफ़्ता हो कर वुसअ'त-ए-अफ़्लाक परजिस को नादानी से हम समझे थे इक मुश्त-ए-ग़ुबारफ़ितना-ए-फ़र्दा की हैबत का ये आलम है कि आजकाँपते हैं कोहसार-ओ-मुर्ग़-ज़ार-ओ-जूएबारमेरे आक़ा वो जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर होने को हैजिस जहाँ का है फ़क़त तेरी सियादत पर मदार
क्या सुनाता है मुझे turk-o-arab की दास्ताँमुझ से कुछ पिन्हाँ नहीं इस्लामियों का सोज़-ओ-साज़ले गए तसलीस के फ़रज़ंद मीरास-ए-ख़लीलख़िश्त-ए-बुनियाद-ए-कलीसा बन गई ख़ाक-ए-हिजाज़हो गई रुस्वा ज़माने में कुलाह-ए-लाला-रंगजो सरापा नाज़ थे हैं आज मजबूर-ए-नियाज़ले रहा है मय-फ़रोशान-ए-फ़रंगिस्तान से पार्सवो मय-ए-सरकश हरारत जिस की है मीना-गुदाज़हिक्मत-ए-मग़रिब से मिल्लत की ये कैफ़िय्यत हुईटुकड़े टुकड़े जिस तरह सोने को कर देता है गाज़हो गया मानिंद-ए-आब अर्ज़ां मुसलमाँ का लहूमुज़्तरिब है तू कि तेरा दिल नहीं दाना-ए-राज़गुफ़्त रूमी हर बना-ए-कुहना कि-आबादाँ कुनंदमी न-दानी अव्वल आँ बुनियाद रा वीराँ कुनंदमुल्क हाथों से गया मिल्लत की आँखें खुल गईंहक़ तिरा चश्मे 'अता कर दस्त-ए-ग़ाफ़िल दर निगरमोम्याई की गदाई से तो बेहतर है शिकस्तमोर-ए-बे-पर हाजते पेश-ए-सुलैमाने मबररब्त-ओ-ज़ब्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा है मशरिक़ की नजातएशिया वाले हैं इस नुक्ते से अब तक बे-ख़बरफिर सियासत छोड़ कर दाख़िल हिसार-ए-दीं में होमुल्क-ओ-दौलत है फ़क़त हिफ्ज़-ए-हरम का इक समरएक हूँ मुस्लिम हरम की पासबानी के लिएनील के साहिल से ले कर ता-ब-ख़ाक-ए-काश्ग़रजो करेगा इम्तियाज़-ए-रंग-ओ-ख़ूँ मिट जाएगातुर्क-ए-ख़र्गाही हो या आराबी-ए-वाला-गुहरनस्ल अगर मुस्लिम की मज़हब पर मुक़द्दम हो गईउड़ गया दुनिया से तू मानिंद-ए-ख़ाक-ए-रह-गुज़रता-ख़िलाफ़त की बिना दुनिया में हो फिर उस्तुवारला कहीं से ढूँढ़ कर अस्लाफ़ का क़ल्ब-ओ-जिगरऐ कि न-शिनासी ख़फ़ी रा अज़ जली हुशियार बाशऐ गिरफ़्तार-ए-अबु-बकर-ओ-अली हुशियार-बाश'इश्क़ को फ़रियाद लाज़िम थी सो वो भी हो चुकीअब ज़रा दिल थाम कर फ़रियाद की तासीर देखतू ने देखा सतवत-ए-रफ़्तार-ए-दरिया का 'उरूजमौज-ए-मुज़्तर किस तरह बनती है अब ज़ंजीर देख'आम हुर्रियत का जो देखा था ख़्वाब इस्लाम नेऐ मुसलमाँ आज तू उस ख़्वाब की ता'बीर देखअपनी ख़ाकिस्तर समुंदर को है सामान-ए-वजूदमर के फिर होता है पैदा ये जहान-ए-पीर देखखोल कर आँखें मिरे आईना-ए-गुफ़्तार मेंआने वाले दौर की धुँदली सी इक तस्वीर देखआज़मूदा फ़ित्ना है इक और भी गर्दूं के पाससामने तक़दीर के रुस्वाई-ए-तदबीर देखमुस्लिम अस्ती सीना रा अज़ आरज़ू-आबाद दारहर ज़माँ पेश-ए-नज़र ला-युख़लिफ-उल-मीआद दार
मैं सुलगते हुए राज़ों को अयाँ तो कर दूँलेकिन उन राज़ों की तशहीर से जी डरता हैरात के ख़्वाब उजाले में बयाँ तो कर दूँउन हसीं ख़्वाबों की ताबीर से जी डरता है
ऐ अन्फ़ुस ओ आफ़ाक़ में पैदा तिरी आयातहक़ ये है कि है ज़िंदा ओ पाइंदा तिरी ज़ातमैं कैसे समझता कि तू है या कि नहीं हैहर दम मुतग़य्यर थे ख़िरद के नज़रियातमहरम नहीं फ़ितरत के सुरूद-ए-अज़ली सेबीना-ए-कवाकिब हो कि दाना-ए-नबातातआज आँख ने देखा तो वो 'आलम हुआ साबितमैं जिस को समझता था कलीसा के ख़ुराफ़ातहम बंद-ए-शब-ओ-रोज़ में जकड़े हुए बंदेतू ख़ालिक़-ए-आसार-ओ-निगारंदा-ए-आनातइक बात अगर मुझ को इजाज़त हो तो पूछूँहल कर न सके जिस को हकीमों के मक़ालातजब तक मैं जिया ख़ेमा-ए-अफ़्लाक के नीचेकाँटे की तरह दिल में खटकती रही ये बातगुफ़्तार के उस्लूब पे क़ाबू नहीं रहताजब रूह के अंदर मुतलातुम हों ख़यालातवो कौन सा आदम है कि तू जिस का है मा'बूदवो आदम-ए-ख़ाकी कि जो है ज़ेर-ए-समावातमशरिक़ के ख़ुदावंद सफ़ेदान-ए-रंगीमग़रिब के ख़ुदावंद दरख़्शंदा फ़िलिज़्ज़ातयूरोप में बहुत रौशनी-ए-इल्म-ओ-हुनर हैहक़ ये है कि बे-चश्मा-ए-हैवाँ है ये ज़ुल्मातरानाई-ए-तामीर में रौनक़ में सफ़ा मेंगिरजों से कहीं बढ़ के हैं बैंकों की इमारातज़ाहिर में तिजारत है हक़ीक़त में जुआ हैसूद एक का लाखों के लिए मर्ग-ए-मुफ़ाजातये 'इल्म ये हिकमत ये तदब्बुर ये हुकूमतपीते हैं लहू देते हैं तालीम-ए-मुसावातबेकारी ओ 'उर्यानी ओ मय-ख़्वारी ओ इफ़्लासक्या कम हैं फ़रंगी मदनियत की फ़ुतूहातवो क़ौम कि फ़ैज़ान-ए-समावी से हो महरूमहद उस के कमालात की है बर्क़ ओ बुख़ारातहै दिल के लिए मौत मशीनों की हुकूमतएहसास-ए-मुरव्वत को कुचल देते हैं आलातआसार तो कुछ कुछ नज़र आते हैं कि आख़िरतदबीर को तक़दीर के शातिर ने किया मातमय-ख़ाना की बुनियाद में आया है तज़लज़ुलबैठे हैं इसी फ़िक्र में पीरान-ए-ख़राबातचेहरों पे जो सुर्ख़ी नज़र आती है सर-ए-शामया ग़ाज़ा है या साग़र ओ मीना की करामाततू क़ादिर ओ 'आदिल है मगर तेरे जहाँ मेंहैं तल्ख़ बहुत बंदा-ए-मज़दूर के औक़ातकब डूबेगा सरमाया-परस्ती का सफ़ीनादुनिया है तिरी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-मुकाफ़ात
ख़ुदा-ए-इज़्ज़-ओ-जल की नेमतों का मो'तरिफ़ हूँ मैंमुझे इक़रार है उस ने ज़मीं को ऐसे फैलायाकि जैसे बिस्तर-ए-कम-ख़्वाब हो दीबा-ओ-मख़मल होमुझे इक़रार है ये ख़ेमा-ए-अफ़्लाक का सायाउसी की बख़्शिशें हैं उस ने सूरज चाँद तारों कोफ़ज़ाओं में सँवारा इक हद-ए-फ़ासिल मुक़र्रर कीचटानें चीर कर दरिया निकाले ख़ाक-ए-असफ़ल सेमिरी तख़्लीक़ की मुझ को जहाँ की पासबानी दीसमुंदर मोतियों मूँगों से कानें लाल-ओ-गौहर सेहवाएँ मस्त-कुन ख़ुशबुओं से मामूर कर दी हैंवो हाकिम क़ादिर-ए-मुतलक़ है यकता और दाना हैअँधेरे को उजाले से जुदा करता है ख़ुद को मैंअगर पहचानता हूँ उस की रहमत और सख़ावत हैउसी ने ख़ुसरवी दी है लईमों को मुझे नक्बतउसी ने यावा-गोयों को मिरा ख़ाज़िन बनाया हैतवंगर हिर्ज़ा-कारों को किया दरयूज़ा-गर मुझ कोमगर जब जब किसी के सामने दामन पसारा हैये लड़का पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही हो
इस भूक के दुख की दुनिया मेंये कैसा सुख का सपना हैवो किस धरती के टुकड़े हैंये किस दुनिया का हिस्सा है5हम जिस आदम के बेटे हैंये उस आदम का बेटा हैये आदम एक ही आदम हैये गोरा है या काला हैये धरती एक ही धरती हैये दुनिया एक ही दुनिया हैसब इक दाता के बंदे हैंसब बंदों का इक दाता हैकुछ पूरब पच्छम फ़र्क़ नहींइस धरती पर हक़ सब का है6ये तन्हा बच्चा बे-चाराये बच्चा जो यहाँ बैठा है
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