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नज़्म
फीका है जिस के सामने अक्स-ए-जमाल-ए-यार
अज़्म-ए-जवाँ को मैं ने वो ग़ाज़ा अता किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
लड़कपन ही से तुम पर फ़िक्र क्यों सर की रही 'ग़ालिब'
न छूटी मय कभी चक्कर न कू-ए-यार का छूटा
हसन नवाब हसन
नज़्म
दिमाग़ अपना क़दम रखते ही पहूँचा अर्श-ए-आ'ला पर
ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ आसमाँ मालूम होती है
नजमा तसद्दुक़
नज़्म
उड़ाते हो हँसी वारफ़्तगान-ए-कू-ए-वहशत की
ख़िरद-मंदो तुम्हें तो हम शरीक-ए-ग़म नहीं करते
मुनीर वाहिदी
नज़्म
लिक्खा हुआ है क़िस्मत-ए-उम्मीद-वार में
''उड़ती फिरेगी ख़ाक तिरी कू-ए-यार में''