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नज़्म
ख़रोश-ए-उम्र के इत्माम तक इक बार उठाना है
अनासिर मुंतशिर हो जाने नब्ज़ें डूब जाने तक
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
तुम तो ख़ुद ही हो ग़ज़ल जिस पे तग़ज़्ज़ुल है निसार
और उसे पढ़ना जो चाहूँ तो न इस का इत्माम
अख़लाक़ अहमद आहन
नज़्म
ताक़ में शम्अ के आँसू हैं अभी तक बाक़ी
अब मुसल्ला है न मिम्बर न मुअज़्ज़िन न इमाम