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नज़्म
कि शम्अ' अब तक बुझी नहीं है
ये वक़्त का इक अजीब लम्हा है जिस की शरयानों में ख़ून जमने लगा है
अख़्तर पयामी
नज़्म
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा