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नज़्म
था सरापा रूह तू बज़्म-ए-सुख़न पैकर तिरा
ज़ेब-ए-महफ़िल भी रहा महफ़िल से पिन्हाँ भी रहा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
न पैदा होगी खत-ए-नस्ख़ से शान-ए-अदब-आगीं
न नस्तालीक़ हर्फ़ इस तौर से ज़ेब-ए-रक़म होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
तेरे जबीं से नूर-ए-हुस्न-ए-अज़ल अयाँ है
अल्लाह-रे ज़ेब-ओ-ज़ीनत क्या औज-ए-इज़्ज़-ओ-शाँ है
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
ये हवस ये चोर बाज़ारी ये महँगाई ये भाव
राई की क़ीमत हो जब पर्बत तो क्यूँ न आए ताव
जोश मलीहाबादी
नज़्म
मैं सारे ज़माने से यकसर जुदा हूँ
मुझे ज़ेब देता है मैं अपनी दीवार में इस तरह से मुक़य्यद रहूँ
सोहैब मुग़ीरा सिद्दीक़ी
नज़्म
ग़ुंचा-ए-दिल मर्द का रोज़-ए-अज़ल जब खुल चुका
जिस क़दर तक़दीर में लिक्खा हुआ था मिल चुका
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ज़ेब-ए-महफ़िल है शरीक-ए-शोरिश-ए-महफ़िल नहीं
ये फ़राग़त बज़्म-ए-हस्ती में मुझे हासिल नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मैं दरवाज़े पे हरकारे की सूरत जा के पहुँचाता
चमकती बूँदें बारिश की किसी की जेब में भर के
गुलज़ार
नज़्म
हुई है ज़ेब-ओ-ज़ीनत और ख़ूबाँ को तो राखी से
व-लेकिन तुम से ऐ जाँ और कुछ राखी के गुल फूले