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नज़्म
हुक़्क़ा सुराही जूतियाँ दौड़ें बग़ल में मार
काँधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहार
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
कहाँ हैं वो कि जो ख़ुद को ख़ुदा समझते हैं
वो जो कि अम्न-ओ-अमाँ के फ़साने कहते हैं
शिफ़ा कजगावन्वी
नज़्म
हमें ज़ोफ़-ए-बसारत से कहाँ थी ताब-ए-नज़्ज़ारा
सिखाए उस के पर्दे ने हमें आदाब-ए-नज़ारा
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
अली अकबर नातिक़
नज़्म
खुलीं जो आँखें तो सर पे नीला फ़लक तना था
चहार-जानिब सियाह पानी की तुंद मौजों का ग़लग़ला था