aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "khade.d"
एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़
जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैंइसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ
न पैराहन न पूरी आधी रोटी अब रहा सालनये साले कुछ भी खाने को न पाएँ गालियाँ खाएँ
मगर हक़ीक़त मेंपेड़ अपनी जगह खड़े हैं
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही होकि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो
हम राख लिए हैं झोली मेंऔर सर पे है साहूकार खड़ा
न तुम को अपने ख़द-ओ-ख़ाल ही नज़र आएँन मैं ये देख सकूँ जाम में भरा क्या है
खेती के कोनों-खुदरों मेंफिर अपने लहू की खाद भरो
वो पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थेखड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह
वो बे-हँगम सी अलमारीजो कोने में खड़ी
वो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानीखड़ी धूप में अपने घर से निकलना
तिरे दर के आगे खड़ा हूँसर--ओ-मू परेशाँ
गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिदशक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की
मैं तुम्हें याद कर रहा थाजब क़ैदियों की गाड़ी अदालत के सामने खड़ी थी
जहाँ पे हम तुम खड़े हैं दोनोंसहर का रौशन उफ़ुक़ यहीं है
ये हम गुनहगार औरतें हैंजो अहल-ए-जुब्बा की तमकनत से न रोब खाएँ
पुराना सूट पहनता है कम वो खाता हैमगर खिलौने मिरे सब ख़रीद लाता है
ढेर से साए पकड़ने के लिए भागते हैंतुम ने साहिल पे खड़े गिरजे की दीवार से लग कर
कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँऔर इक दीवार के आगे खड़ा हूँ
मालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँ
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