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नज़्म
हर ज़बाँ का लफ़्ज़ खप जाए ये वुसअ'त इस में है
हर लुग़त के जज़्ब कर लेने की ताक़त इस में है
सफ़ी लखनवी
नज़्म
इसी मक़बूज़ा रियासत पे है क़ाएम सब कुछ
क़ौम के खाप के मज़हब के ये ऊँचे गुंबद
योगेंद्र दत्त त्यागी
नज़्म
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सो गई रास्ता तक तक के हर इक राहगुज़ार
अजनबी ख़ाक ने धुँदला दिए क़दमों के सुराग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तले
खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब