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नज़्म
मजीद अमजद
नज़्म
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
उस खींचा-खींच घसीटी पर भड़वे रंडी का फक्कड़ हो
माजून, शराबें, नाच, मज़ा, और टिकिया सुल्फ़ा कक्कड़ हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हम से ग़रीब ग़ुरबा कीचड़ में गिर पड़े हैं
हाथों में जूतियाँ हैं और पाएँचे चढ़े हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जब लगाया हक़ का नारा दार पर खींचा गया
नख़्ल-ए-सनअ'त इस के ख़ूँ की धार पर सींचा गया