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नज़्म
सुन कर 'हया' का नग़्मा महज़ूज़ होंगे सामेअ'
देता है क्या हलावत शीरीं सुख़न हमारा
सुग़रा हुमयूँ मिर्ज़ा
नज़्म
जो लोगों को बद-सूरती से डरा कर महज़ूज़ होता रहे
अब मैं ख़ूब-सूरती के लिए क्या लिखूँ
एच.बी. बलूच
नज़्म
आँखें खोलीं जन्नत बदली बदली सी दुनिया की देखी
लब खोले हैं लफ़्ज़ों की लज़्ज़त से लब महज़ूज़ हुए हैं
राज नारायण राज़
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएँ जिन में
उस के मल्बूस की अफ़्सुर्दा महक बाक़ी है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरें हैं
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं