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नज़्म
कुछ और मिरे ख़्वाब हैं कुछ और मिरा दौर
ख़्वाबों के नए दौर में ने मोर ओ मलख़ ने असद ओ सौर
नून मीम राशिद
नज़्म
क़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़
ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
शुमाल-ए-जावेदाँ अपना शुमाल-ए-जावेदान-ए-जाँ
है अब भी अपनी पूँजी इक मलाल-ए-जावेदान-ए-जाँ
जौन एलिया
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
शिद्दत-ए-कर्ब में डूबी हुई मेरी गुफ़्तार
मैं कि ख़ुद अपने मज़ाक़-ए-तरब-आगीं का शिकार
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम है
ख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक-सरिश्त
मशहूर जिन के दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
देखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हाल
सकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलाल