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नज़्म
तू चमन में उड़ के क्या आई कि आ पहुँची बहार
गा रही हैं छोटी चिड़ियाँ सब्ज़ कुंजों में मल्हार
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
मगर एक भी ख़्वाब मेरे तसव्वुर से आबाद कब है
तुम्हारे लबों पर ये नग़्मे भला कब मिरी शान में हैं
रफ़ीआ शबनम आबिदी
नज़्म
होंटों पर तहज़ीब के कैसी दबी दबी ये चीख़ें हैं
हम तो यहाँ सुनने आए थे रागनियाँ मल्हार और ताल
नाशिर नक़वी
नज़्म
इस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहीं
दाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं