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नज़्म
अब सब्र के मीठे फल आहें भर भर कर खाते हैं
मालन को बना बैठे ख़ाला माली को रुलाना छोड़ दिया
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
सबीलें अब भी नन्हे-मुन्ने हाथों से लगाते हैं
वो मिट्टी के घड़ों पर सुर्ख़ गाबिस मल के
इशरत आफ़रीं
नज़्म
देस देस में पलने वाले प्यारे प्यारे बच्चो
आने वाले कल में होगे तुम इस बाग़ के माली
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
जहाँ आमों के हों बाग़ और कोई रखवाला न हो हरगिज़
कोई कुत्ता भी माली ने जहाँ पाला न हो हरगिज़
अख़्तर शीरानी
नज़्म
खुला है मय-कदे का दर और इज़्न-ए-आम है सब को
वहाँ पर आज रिंदों की क़तार अंदर क़तार आई