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नज़्म
वही सुब्ह-ओ-मसा होती है लेकिन तुम नहीं होतीं
बड़ी रंगीं फ़ज़ा होती है लेकिन तुम नहीं होतीं
शौकत परदेसी
नज़्म
तेरे रिश्ते-दार भी हैं अब तिरे बद-ख़्वाह देख
कर रहे हैं जो तुझे सुब्ह-ओ-मसा गुमराह देख
असद जाफ़री
नज़्म
इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर
इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन
जौन एलिया
नज़्म
उम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैं
इज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फ़र्ज़ करो ये जोग बजोग का हम ने ढोंग रचाया हो
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ