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नज़्म
''हर एक करवट मैं याद करता हूँ तुम को लेकिन
ये करवटें लेते रात दिन यूँ मसल रहे हैं मिरे बदन को
गुलज़ार
नज़्म
लब पर है तल्ख़ी-ए-मय-ए-अय्याम वर्ना 'फ़ैज़'
हम तल्ख़ी-ए-कलाम पे माइल ज़रा न थे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैल
सब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
घुला घुला सा फ़लक है धुआँ धुआँ सी है शाम
है झुटपुटा कि कोई अज़दहा है माइल-ए-ख़्वाब
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
ज़मीं चीं-बर-जबीं है आसमाँ तख़रीब पर माइल
रफ़ीक़ान-ए-सफ़र में कोई बिस्मिल है कोई घाएल
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मसीह ओ ख़िज़्र की कहने को कुछ कमी ही नहीं
गुज़र भी जा कि तिरा इंतिज़ार कब से है
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
हर ज़बाँ पर अब सला-ए-जंग है ये भी तो देख
फ़र्श-ए-गीती से सकूँ अब माइल-ए-परवाज़ है