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नज़्म
मिरे चेहरे पे जब भी फ़िक्र के आसार पाए हैं
मुझे तस्कीन दी है मेरे अंदेशे मिटाए हैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है ये
कितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है ये
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आ ग़ैरियत के पर्दे इक बार फिर उठा दें
बिछड़ों को फिर मिला दें नक़्श-ए-दुई मिटा दें