aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "mouse"
काम मक्तूब का माउस से लिया जाता हैआह-ए-सोज़ाँ को भी अपलोड किया जाता है
तू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराब
मगर आहंग मेरा खो गया शायद कहाँ जानेकोई मौज-ए-... कोई मौज-ए-शुमाल-ए-जावेदाँ जाने
ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मरये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर
ये दर्द मौज-ए-सबा हुआ हैये आग दिल की सदा बनी है
ऐ मौज-ए-दजला तू भी पहचानती है हम कोअब तक है तेरा दरिया अफ़्साना-ख़्वाँ हमारा
इसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूद
बस्ती की हर इक शादाब गली ख़्वाबों का जज़ीरा थी गोयाहर मौज-ए-नफ़स हर मौज-ए-सबा नग़्मों का ज़ख़ीरा थी गोया
मौज-ए-मुज़्तर थी कहीं गहराइयों में मस्त-ए-ख़्वाबरात के अफ़्सूँ से ताइर आशियानों में असीर
नहीं जो मौज-ए-सबा में कोई शमीम-ए-पयामतो अब सबा में सबा के सिवा कुछ और नहीं
वो मौज-ए-ज़र जो तिरी नज़र है
मौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिरा
लहलहाते हैं जिस तरह दिल मेंमौज-ए-दर्द-ए-फ़िराक़-ए-यार आए
आज हर मौज-ए-हवा से है सवाली ख़िल्क़तला कोई नग़्मा कोई सौत तिरी उम्र दराज़
सुकूत-ए-शाम में दरमांदगी का आलम हैरुकी रुकी सी किसी सोच में है मौज-ए-सबा
मैं तुझ को देख के ख़ुद से सवाल करता हूँये मौज-ए-रंग ज़मीं पर कहाँ से उतरी है
होता है उन पे फ़ज़्ल जो रब्ब-ए-करीम कामौज-ए-सुमूम बनती है झोंका नसीम का
मेरे लिए तुम सरगर्दां थेबहर था मैं तुम मौज-ए-रवाँ थे
रफ़्तार है कि चाँदनी रातों में मौज-ए-गंगया भैरवीं की पिछले पहर क़ल्ब में उमंग
चश्मा-ए-दामन तिरा आईना-ए-सय्याल हैदामन-ए-मौज-ए-हवा जिस के लिए रूमाल है
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