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नज़्म
डाकुओं के दौर में परहेज़-गारी जुर्म है
जब हुकूमत ख़ाम हो तो पुख़्ता-कारी जुर्म है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
हर देन क़ुबूलूँ मैं उस की तू करता है परहेज़ बड़े
मैं दिल की चाह करूँ पूरी तू सिर्फ़ अदा-ए-फ़र्ज़ करे
सदा अम्बालवी
नज़्म
हो ज़्याबतीस जिसे उस की दवा परहेज़ है
है रफ़ीक़-ए-ज़िंदगी ये दुख जो दर्द-आमेज़ है
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
यहाँ परहेज़ कैसा आओ रिंदान-ए-वतन आओ
कि जाम अपना है अपना मै-कदा पीर-ए-मुग़ाँ अपना
राम लाल वर्मा हिंदी
नज़्म
गोशा-नशीनी के चिल्लों से परहेज़
फीके ज़माने की तस्बीह के तय-शुदा सब वज़ीफ़ों से बे-लज़्ज़ती
इरफ़ान शहूद
नज़्म
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जल्वे पराए हैं
मिरे हमराह भी रुस्वाइयाँ हैं मेरे माज़ी की