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नज़्म
बे-तरह ज़िंदगी के सभी क़ाएदे तोड़ना
ज़ेहन को याद-ए-माज़ी की काँटों-भरी सख़्त दीवार पर मारना
अली उल-हसनैन
नज़्म
किस मोहब्बत से सिखाती है अदब के क़ा'एदे
नाज़ के पाले हुए परवान चढ़ते हैं यहीं
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
दरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसी
बीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहे