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नज़्म
ता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्या
आ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्या
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
और उन में हैं वो जाम भी जिन को मुग़ल ले आए थे
तातार से क़ंधार से काबुल से रुकना-बाद से
अली जवाद ज़ैदी
नज़्म
ये जुनूँ-ज़ार मिरा मेरे ग़ज़ालों का जहाँ
मेरा नज्द आ ही गया मेरा ततार आ ही गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
और मरमर के भारी सुतूनों से लिपटी हुई लड़कियाँ हैं
और फ़सीलों के उस पार तातार-ओ-तैमूर का ख़ौफ़ है
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
नज़्म
सिनान ओ गुर्ज़ ओ शमशीर ओ तबर ख़ंजर नहीं लाज़िम
बस इक एहसास लाज़िम है कि हम बुअदैन हैं दोनों
जौन एलिया
नज़्म
महाज़-ए-जंग से हरकारा तार लाया है
कि जिस का ज़िक्र तुम्हें ज़िंदगी से प्यारा था
साहिर लुधियानवी
नज़्म
है मिरी जुरअत से मुश्त-ए-ख़ाक में ज़ौक़-ए-नुमू
मेरे फ़ित्ने जामा-ए-अक़्ल-ओ-ख़िरद का तार-ओ-पू