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नज़्म
न दरख़्तों से किसी शाख़ के गिरने की सदा गूँजेगी
फड़फड़ाहट किसी ज़ंबूर की भी कम ही सुनाई देगी
नून मीम राशिद
नज़्म
जहाँ ज़िंदगी के रसीदा शगूफ़ों के सीनों
से ख़्वाबों के रम-दीदा ज़ंबूर लेते हैं रस और पीते हैं वो
नून मीम राशिद
नज़्म
ज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर दे
चमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर दे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मेरे आक़ा वो जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर होने को है
जिस जहाँ का है फ़क़त तेरी सियादत पर मदार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अपनी दुनिया आप पैदा कर अगर ज़िंदों में है
सिर्र-ए-आदम है ज़मीर-ए-कुन-फ़काँ है ज़िंदगी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीर
है इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीर